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धर्मेन्द्र कुमार सिंह's Blog (235)

कविता : हम-तुम

हम-तुम
जैसे सरिया और कंक्रीट
दिन भर मैं दफ़्तर का तनाव झेलता हूँ
और तुम घर चलाने का दबाव

इस तरह हम झेलते हैं
जीवन का बोझ
साझा करके

किसी का बोझ कम नहीं है
न मेरा न तुम्हारा

झेल लेंगें हम
आँधी, बारिश, धूप, भूकंप, तूफ़ान
अगर यूँ ही बने रहेंगे
इक दूजे का सहारा

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 17, 2011 at 11:44pm — 1 Comment

प्यार की वैज्ञानिक व्याख्या

क्या?

प्यार की वैज्ञानिक व्याख्या चाहिए

तो सुनो

ब्रह्मांड का हर कण

तरंग जैसा भी व्यवहार करता है

और उसकी तरंग का कुछ अंश

भले ही वह नगण्य हो

ब्रह्मांड के कोने कोने तक फैला होता है



आकर्षण और कुछ नहीं

इन्हीं तरंगों का व्यतिकरण है

और जब कभी इन तरंगों की आवृत्तियाँ

एक जैसी हो जाती हैं

तो तन और मन के कम्पनों का आयाम

इतना बढ़ जाता है

कि आत्मा तक झंकृत हो उठती है

इस क्रिया को विज्ञान अनुनाद कहता हैं

और आम इंसान

प्यार



इसलिए… Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 11, 2011 at 1:04pm — 5 Comments

कविता : लोकतंत्र का क्रिकेट

बड़ा अजीब खेल है लोकतंत्र का क्रिकेट

एक गेंद के पीछे ग्यारह सौ मिलियन लोग

उछल कर, गिर कर

झपट कर, लिपट कर

पकड़नी पड़ती है गेंद

कभी जमीन से, कभी आसमान से

जिसकी किस्मत अच्छी हो उसी को मिलती है गेंद



और बल्लेबाज

उसे तो मजा आता है क्षेत्र रक्षकों को छकाने में

अगर किसी तरह सबने मिलकर

बल्लेबाज को आउट कर भी दिया

तो फिर वैसा ही नया बल्लेबाज

उसका भी लक्ष्य वही

अगर पूरी टीम आउट हो गई

तो दूसरी टीम के बल्लेबाजों का भी लक्ष्य वही

सबसे ज्यादा पैसा… Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 27, 2011 at 10:20pm — 3 Comments

कविता : चिकनी मिट्टी और रेत

चिकनी मिट्टी के नन्हें नन्हें कणों में

आपसी प्रेम और लगाव होता है

हर कण दूसरों को अपनी ओर

आकर्षित करता है

और इसी आकर्षण बल से

दूसरों से बँधा रहता है



रेत के कण आकार के अनुसार

चिकनी मिट्टी के कणों से बहुत बड़े होते हैं

उनमें बड़प्पन और अहंकार होता है

आपसी आकर्षण नहीं होता

वो एक दूसरे की गति का विरोध करते हैं

उनमें केवल आपसी घर्षण होता है



चिकनी मिट्टी के कणों के बीच

आकर्षण के दम पर

बना हुआ बाँध

बड़ी बड़ी नदियों का प्रवाह रोक देता… Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 24, 2011 at 12:48am — 4 Comments

ग़ज़ल : वो जो रुख़-ए-हवा समझते हैं

वो जो रुख़-ए-हवा समझते हैं
हम उन्हें धूल सा समझते हैं ॥१॥

चाँद रूठा ये कहके उसको हम
एक रोटी सदा समझते हैं ॥२॥

धूप भी तौल के बिकेगी अब
आप बाजार ना समझते हैं ॥३॥

तोड़ कर देख लें वो पत्थर से
जो हमें काँच का समझते हैं ॥४॥

जो बसें मंदिरों की नाली में
वो भी खुद को ख़ुदा समझते हैं ॥५॥

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 7, 2011 at 11:26pm — 3 Comments

ग़ज़ल : हर अँधेरा ठगा नहीं करता

हर अँधेरा ठगा नहीं करता

हर उजाला वफा नहीं करता

 

देख बच्चा भी ले ग्रहण में तो

सूर्य उसपर दया नहीं करता

 

चाँद सूरज का मैल भी ना हो

फिर भी तम से दगा नहीं करता

 

बावफा है जो देश खाता है

बेवफा है जो क्या नहीं करता

 

गल रही कोढ़ से सियासत है

कोइ अब भी दवा नहीं करता

 

प्यार खींचे इसे समंदर का

नीर यूँ ही बहा नहीं करता

 

झूठ साबित हुई कहावत ये

श्वान को घी पचा नहीं…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 8, 2011 at 11:30pm — 6 Comments

ग़ज़ल : दरख़्त बदल रहा है

दरख़्त बदल रहा है

स्वयं खा फल रहा है ।१।

 

मैं लाया आइना क्यूँ

ये सबको खल रहा है ।२।

 

दिया सबने जलाया

महल अब गल रहा है ।३।

 

छुवन वो प्रेम की भी

अभी तक मल रहा है ।४।

 

डरा बच्चों को ही अब

बड़ों का बल रहा है ।५।

 

लिखा जिस पर खुदा था

वही घर जल रहा है ।६।

 

दहाड़े जा रहा वो

जो गीदड़ कल रहा है ।७।

 

उगा तो जल चढ़ाया

अगन दो ढल रहा है ।८।

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on January 24, 2011 at 9:30pm — 3 Comments

कविता : गूलर का फूल

कितने किस्से गढ़े गए

गूलर के फूल पर…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on January 13, 2011 at 10:52am — 4 Comments

ग़ज़ल : ग़ज़ल पर ग़ज़ल क्या कहूँ मैं

बहर : फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन

बहरे मुतकारिब मुसद्दस सालिम…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 31, 2010 at 4:34pm — 4 Comments

नवगीत : प्रेम हो गया आज नमकीन

प्रेम हो गया आज नमकीन

 …

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 26, 2010 at 11:25pm — 3 Comments

विज्ञान के विद्यार्थी का प्रेम गीत

अवकलन समाकलन

फलन हो या चलन-कलन

हरेक ही समीकरन

के हल में तू ही आ मिली



घुली थी अम्ल क्षार में

विलायकों के जार में

हर इक लवण के सार में

तु ही सदा घुली मिली



घनत्व के महत्व में

गुरुत्व के प्रभुत्व में

हर एक मूल तत्व में

तु ही सदा बसी मिली



थीं ताप में थीं भाप में

थीं व्यास में थीं चाप में

हो तौल या कि माप में

सदा तु ही मुझे मिली



तुझे ही मैंने था पढ़ा

तेरे सहारे ही बढ़ा

हुँ आज भी वहीं खड़ा

जहाँ मुझे थी तू…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 12, 2010 at 6:33pm — 3 Comments

कविता : हवाई जहाज

हवाई जहाज को

दुनिया और ख़ासकर शहर

बड़े खूबसूरत नजर आते हैं

सपाट चमचमाती सड़कों से उड़ना

रुई के गोलों जैसे

सफेद बादलों के पार जाना

हर समय चमचमाते हुए

हवाई अड्डों पर उतरना या खड़े रहना

दरअसल

असली दुनिया क्या होती है

हवाई जहाज

ये जानता ही नहीं

वो अपना सारा जीवन

असली दुनिया से दूर

सपनों की चमकीली दुनिया में ही बिता देता है



हवाई जहाज भी क्या करे

उसका निर्माण किया ही गया है

सपनों की दुनिया में रहने के लिए

वो रिक्शे या साइकिल…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 11, 2010 at 8:20pm — 1 Comment

कविता : चश्मा

कुछ दिनों पहले उसके पास
दो सौ रूपए का चश्मा था
बार बार उसके हाथों से गिर जाता था
और वो बड़ी शान से सबसे कहता था
मेहनत की कमाई है
खरोंच तक नहीं आएगी।

आज वो चार हजार का चश्मा पहनता है
मगर वो चश्मा जरा सा भी
किसी चीज से छू जाता है
तो वह तुरंत उलट पलट कर
ये देखने लगता है
कि कहीं चश्मे में
कोई खरोंच तो नहीं आ गई।

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 24, 2010 at 9:00pm — No Comments

हिन्दी कविता का अन्तर्जाल युग और ओबीओ लाइव महाइवेंट - १

हिन्दी कविता एक नए युग में प्रवेश कर चुकी है। इस युग में हिन्दी कविता वैश्विक मंच पर अन्तर्जाल के माध्यम से अपनी पहचान बना रही है । इसलिए इस युग को “अन्तर्जाल युग” ही कहा जाय तो ठीक रहेगा। आज के समय में अन्तर्जाल का प्रयोग करने वालों की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है। इसमें हिन्दीभाषी लोगों की संख्या भी कम नहीं है। धीरे धीरे ही सही अन्तर्जाल के माध्यम से हिन्दी कविता विश्व के कोने कोने तक पहुँच रही है। आज अधिकांश हिन्दी कविताएँ अन्तर्जाल पर उपलब्ध हैं। अब उभरते हुए कवियों को प्रकाशित होने के लिए… Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 11, 2010 at 3:43pm — 3 Comments

कविता: घास

घास कहीं भी उग आती है

जहाँ भी उसे काम चलाऊ पोषक तत्व मिल जाँय,

इसीलिए उसे बेशर्म कहा जाता है,

इतनी बेइज्जती की जाती है;



घास का कसूर ये है

कि उसे जानवरों को खिलाया जाता है

इसीलिए उसकी बेइज्जती करने के लिए

मुहावरे तक बना दिये गए हैं

कोई निकम्मा हो तो उसे कहते हैं

वो घास छील रहा है;



जिस दिन घास असहयोग आन्दोलन करेगी

उगना बन्द कर देगी

और लोगों को अपने हिस्से का खाना

जानवरों को देना पड़ेगा

अपने बच्चों को दूध पिलाने के… Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on October 7, 2010 at 8:00pm — 2 Comments

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