विकल विदा के क्षण
सिहरता सूनापन
संग्रहीत हैं अनायास उमड़ते अनुभव
पता नहीं अब जीवन के इस छोर पर
प्रलय-पवाह जो भीतर में है
वह बाहर व्याप्त हो रहा है, या
स्तब्धता जो बाहर है, घुटती-बढ़ती
आकर समा गई है हृदय में आज
मेरी कमज़ोरियों का रूपांकन करती
शोचनीय स्थिति मेंं मूलभूत समस्याएँ
अवसर-अनवसर झुठलाती हैं मुझको
उभरते हैं पुराने जमे दुखों के बुलबुले
दुख में छटपटाती सलवटों …
ContinueAdded by vijay nikore on December 17, 2017 at 7:21am — 21 Comments
समय की कोई अनदेखी गुमनाम कढ़ी
संभावनाओं की रूपक रश्मि से भरी
प्राण-श्वास को पूर्ण व पुलकित करती
पेड़ों की छायाएँ घटती मिटती बढ़ती-सी
धरती के गालों पर छायाएँ बेचैन नहीं थीं
किसी मीठे समीर की मीठी कोमल झकोर
हँसा कर फूलों को करती थी आत्म-विभोर
प्रात की नई उमंगों में भू को नभ से जोड़ते
जिज्ञासा की उजली चादर के फैलाव में हम
कोरे बचपन में एक ही पथ पर थे साथ चले
आयु की मामूली सच्चाईओं से घिरे हम…
ContinueAdded by vijay nikore on December 3, 2017 at 12:36am — 10 Comments
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