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Anwesha Anjushree's Blog – December 2012 Archive (6)

मेरा परिचय .

समय से परे, अगर जो कभी हम मिले

अलग से ही कुछ नाम से

अलग से ही रंग-रुप में

क्या तुम मुझे पहचान लोगे?



शायद मेरा स्पर्श या हृदय का स्पन्दन अलग हो,

मेरी बोली, मेरी अभिव्यक्ति अलग हो,

मेरा चेहरा या मेरे भाव अलग हो,

क्या तुम मुझे पहचान लोगे?



गर पवन बन मैं छु लूं तुम्हे,

या वृष्टि बन तुम्हारे रोम-रोम को भिगाउँ ,

नीर…

Continue

Added by Anwesha Anjushree on December 17, 2012 at 5:00pm — 7 Comments

एक भिक्षुक की याचना .....

मुझे जानो समझो
पर इतना न झकझोरो
कि मैं नग्न हो जाऊं
अपमानित फिरू !

यह जो पाने, न पाने के दायरे है
तुम्ही कहो, इन्हें मैं कैसे तोडू ?
अगर मुझे पूर्ण न कर सको
तो न समझने का भान करो !
पर इतना भी न झकझोरो
कि मैं नग्न हो जाऊं
अपमानित फिरू !
अन्वेषा....
हम सब के ह्रदय में कही न कही एक भिक्षुक छुपा हुआ है !

Added by Anwesha Anjushree on December 16, 2012 at 9:00am — 10 Comments

मुक्ति.....

सौम्य शांत सी चली थी
निंद्रा से चिर निंद्रा की ओर
उसे निंद्रा से जगाने की कोशिश थी
थी भाग दौड़ !
उम्र भर की मानसिक यातना से
थी आज मुक्ति की ओर अग्रसर ,
अस्पताल के एक कोने में उसका
शरीर था पड़ा एक बिस्तर पर ,
बैठी थी पास ही उसके
उसकी बिटिया मूक दर्शक बनकर ,
रही थी माँ को एकटुक निहार !
और जैसे कह रही हो बारम्बार...
माँ, तुझे न रोकूंगी आज
ले लो मुझसे मुक्ति का उपहार !

अन्वेषा

Added by Anwesha Anjushree on December 15, 2012 at 4:00pm — 8 Comments

असीमित ...

व्यस्त फुटपाथ की तपती फर्श पर ,
तपती धूप की किरणों से ,
जलते शरीर से बेखबर,
मक्खियों की भीड़ से बेअसर ,
फटे-गंदे कपड़ो से लिपटे
भूखे पेट, एक माँ बच्ची के साथ
बेसुध सो रही ...
कही सामाजिक अव्यवस्था तो..
कही नियति ही सही,
पर मनुष्य के कष्ट सहने के शक्ति की
कोई सीमा भी तो नहीं !!! अन्वेषा

Added by Anwesha Anjushree on December 14, 2012 at 4:00pm — 11 Comments

मन...

मन ही सवालों से उलझता है !
मन ही सवालों से कतराता है !
मन ही दर-बदर भटकता है!
मन ही भूलने की बात करता है !
झगड़ता है, चिल्लाता है , कोसता है!
यह मन ही तो है जो रोता है !
अनुभव है ,सच नहीं है,
जाने भी दो, जिंदगी है ,
समझकर सबकुछ खुद को ,
समझाने की कोशिश करता है !
कुछ पल तो शांत बैठता है
और फिर अचानक -
मन ही मन कह उठता है
आह! खट्टे अंगूर !

अन्वेषा

Added by Anwesha Anjushree on December 14, 2012 at 3:30pm — 9 Comments

उन्मुक्त

हसरते, अरमान

तिरस्कार, अपमान

इन्हें लक्ष्मण रेखा को न पार करने दो

या फिर इन्हें कैद करो ऐसे

यह सांस भी न ले पाए जैसे

और चाबी ऐसे दफनाओ

के खुद भी न ढुंढ पाओ

फिर उड़ो ,पंख फैलाओ…

Continue

Added by Anwesha Anjushree on December 13, 2012 at 10:00pm — 6 Comments

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