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मन ही सवालों से उलझता है !
मन ही सवालों से कतराता है !
मन ही दर-बदर भटकता है!
मन ही भूलने की बात करता है !
झगड़ता है, चिल्लाता है , कोसता है!
यह मन ही तो है जो रोता है !
अनुभव है ,सच नहीं है,
जाने भी दो, जिंदगी है ,
समझकर सबकुछ खुद को ,
समझाने की कोशिश करता है !
कुछ पल तो शांत बैठता है
और फिर अचानक -
मन ही मन कह उठता है
आह! खट्टे अंगूर !

अन्वेषा

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Comment

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Comment by Anwesha Anjushree on December 15, 2012 at 4:14pm

Seema ji, Vinus ji, Arun ji, Ajay ji aur Rajesh ji...abhar.....--/\--


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on December 15, 2012 at 2:39pm

हम तो सच में मन के हाथों कठपुतली की तरह हैं जैसे चाहे मन नचाता जो है दिमाग समझाता है पर मन उस पर हावी हो जाता है आपकी रचना यही सब कह रही है बहुत सुन्दर लिखा आपको शायद पहली बार पढ़ रही हूँ बधाई आपको 

Comment by Dr.Ajay Khare on December 15, 2012 at 2:00pm

chanchal man ka chitran badia he badhai

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 15, 2012 at 11:23am

आदरणीया आपने मन को बड़े मन से रचना में उतारा है, बधाई स्वीकारें

Comment by वीनस केसरी on December 15, 2012 at 2:58am

सुख - दुःख,

दोनों पहलूओं पर विचार मंथन करती सुन्दर अभिव्यक्ति

Comment by seema agrawal on December 15, 2012 at 12:33am

मन की चतुराई को अच्छा समझाया है आपने ........
ऐ मन रुक 

थोडा समझ लूं तुझे 

ढाल लूं तुझे शब्दों में 

गा लूं तेरे सुरों को 

उफ़ नहीं

तू जा ,छुप जा 

आखिर लोग क्या कहेंगे..... :) 

Comment by Anwesha Anjushree on December 14, 2012 at 8:19pm

Prachi Singh ji..Saurabh Pandey Ji..aap dono ka bahut bahut SHukriya, mujhe padhne ke liye aur utsahit karne ke liye ...


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 14, 2012 at 7:44pm

पा गये तो खूब वर्ना खट्टे अंगूर ! वैचारिकता को शब्द-शब्द उतारते जाना अच्छा लगा. प्रस्तुति हेतु बधाई, अन्वेषाजी.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on December 14, 2012 at 6:34pm

मन ही मन कह उठता है
आह! खट्टे अंगूर !....................मन के हारे हार है, मन के जीते जीत.

मन का एक्सरे सुन्दर है.बधाई 

कृपया ध्यान दे...

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