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Naveen Mani Tripathi's Blog – December 2019 Archive (4)

ग़ज़ल

1212 1122 1212 22

हमारे इल्म  का  वो  क़द्रदान  थोड़ी है ।

हमें  दे  रोटियां  कोई  महान  थोड़ी है ।।

उसे है बेचना हर ईंट इस इमारत की ।

हुज़ूर मुफ़्त में वो मिह्रबान थोड़ी है ।।

विकास सब का हो और साथ भी रहे सबका ।

ये राजनीति है पक्की ज़ुबान थोड़ी है ।।

लुढ़क रहे हैं ख़ज़ाने ये फ़िक्र कौन करे…

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Added by Naveen Mani Tripathi on December 17, 2019 at 2:49pm — 1 Comment

ग़ज़ल

2122 1212 22

.

मत  कहो  आप  दौरे   गुरबत   है ।

चश्मेतर  हूँ  ये   वक्ते  फुरकत  है ।।

कुछ तो भेजी खुदा ने  आफ़त है ।

ये  तबस्सुम  है  या  क़यामत  है ।।

उसकी किस्मत को दाद  देता  हूँ ।

जिसको हासिल तुम्हारी कुर्बत है ।।

अलविदा  मत  कहें  हुजूर  अभी ।

बज़्म   को  आपकी  ज़रूरत  है ।।

इश्क़  में  क्या …

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Added by Naveen Mani Tripathi on December 16, 2019 at 12:30pm — 1 Comment

ग़ज़ल

2122 2122 2122 212

कुछ मुहब्बत कुछ शरारत और कुछ धोका रहा ।

हर अदा ए इश्क़ का दिल तर्जुमा करता रहा ।।

याद है अब तक ज़माने को तेरी रानाइयाँ ।

मुद्दतों तक शह्र में चलता तेरा चर्चा रहा ।।

पूछिए उस से भी साहिब इश्क़ की गहराइयाँ ।

जो किताबों की तरह पढ़ता कोई चहरा रहा ।।

वो मेरी पहचान खारिज़ कर गया है शब के बाद ।

जो मेरे खाबों में आकर गुफ्तगू करता रहा ।।

साजिशें रहबर की थीं या था मुकद्दर का कसूर ।

ये मुसाफ़िर…

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Added by Naveen Mani Tripathi on December 9, 2019 at 12:33am — No Comments

ग़ज़ल

ग़ज़ल

हर इक सू से सदा ए सिसकियाँ अच्छी नहीं लगतीं ।

सुना है इस वतन को बेटियां अच्छी नहीं लगतीं ।।

न जाने कितने क़ातिल घूमते हैं शह्र में तेरे ।

यहाँ कानून की खामोशियाँ अच्छी नहीं लगतीं ।।

सियासत के पतन का देखिये अंजाम भी साहब ।

दरिन्दों को मिली जो कुर्सियां अच्छी नहीं लगतीं।।

वो सौदागर है बेचेगा यहाँ बुनियाद की ईंटें ।

बिकीं जो रेल की सम्पत्तियां अच्छी नहीं लगतीं ।।

बिकेगी हर इमारत…

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Added by Naveen Mani Tripathi on December 4, 2019 at 2:02am — 7 Comments

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