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धर्मेन्द्र कुमार सिंह's Blog – November 2016 Archive (3)

हम उनके बिना भी हुए कब अकेले (ग़ज़ल)

बह्र :  १२२ १२२ १२२ १२२

 

सनम छोड़ जाते हैं यादों के मेले

हम उनके बिना भी रहे कब अकेले

 

मैं समझाऊँ कैसे ये चारागरों को

उन्हें छू के हो जाते मीठे करेले

 

रहे यूँ ही नफ़रत गिराती नये बम

न कम कर सकेगी मुहब्बत के रेले

 

मैं कितना भी कह लूँ ये नाज़ुक बड़ा है

सनम बेरहम दिल से खेले तो खेले

 

इन्हें दे नये अर्थ नन्हीं शरारत

वगरना निरर्थक हैं जग के झमेले

-------------

(मौलिक एवं…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 27, 2016 at 6:30pm — 12 Comments

उतर जाए अगर झूठी त्वचा तो (ग़ज़ल)

बह्र : १२२२ १२२२ १२२

 

उतर जाए अगर झूठी त्वचा तो।

सभी हैं एक से साबित हुआ, तो।

 

शरीअत में हुई झूठी कथा, तो।

न मर कर भी दिखा मुझको ख़ुदा, तो।

 

वो दोहों को ही दुनिया मानता है,

कहा गर जिंदगी ने सोरठा, तो।

 

समझदारी है उससे दूर जाना,

अगर हो बैल कोई मरखना तो।

 

जिसे मशरूम का हो मानते तुम,

किसी मज़लूम का हो शोरबा, तो।

 

न तुम ज़िन्दा न तुममें रूह ‘सज्जन’

किसी दिन गर यही…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 19, 2016 at 10:08pm — 10 Comments

हम ग्यारह हैं (कविता)

हमें साथ रहते दस वर्ष बीत गये

दस बड़ी अजीब संख्या है

 

ये कहती है कि दायीं तरफ बैठा एक

मैं हूँ

तुम शून्य हो

 

मिलकर भले ही हम एक दूसरे से बहुत अधिक हैं

मगर अकेले तुम अस्तित्वहीन हो

 

हम ग्यारह वर्ष बाद उत्सव मनाएँगें

क्योंकि अगर कोई जादूगर हमें एक संख्या में बदल दे

तो हम ग्यारह होंगे

दस नहीं

-------

(मौलिक एवंं अप्रकाशित)

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 9, 2016 at 8:02pm — 3 Comments

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