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Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s Blog – October 2017 Archive (2)

तब सिवा परमेश्वर के औ'र जला है कौन-----गज़ल, पंकज मिश्र

2122 2122 2122 2122



धीरे धीरे दूर दुनिया से हुआ है कौन आख़िर

हौले हौले तेरी यादों में घुला है कौन आख़िर



आग के शोले जले जब भी हुआ उत्पात तब तब

इक सिवा परमेश्वर के औ'र जला है कौन आख़िर



ग्रन्थ लाखों और पढ़ने वाले अरबों लोग तो हैं

पर मुझे मिलता नहीं पढ़ कर जगा है कौन आख़िर



माँ पिता गुरु के चरण रज से रहा जो दूर है वो

पत्थरों के घर में प्रभु से मिल सका है कौन आख़िर



इक मधुर अहसास खश्बू से भरी है साँस 'पंकज'

धड़कनों से रागिनी बन कर… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 12, 2017 at 5:30pm — 13 Comments

सवालों का पंछी सताता बहुत है-गीत

मुझे रात भर ये भगाता बहुत है।

सवालों का पंछी सताता बहुत है।।

कभी भूख से बिलबिलाता ये आए

कभी आँख पानी भरी ले के आए

कभी खूँ से लथपथ लुटी आबरू बन

तो आये कभी मेनका खूबरू बन

ये धड़कन को मेरी थकाता बहुत है

सवालों का पंछी सताता बहुत है।।1।।

कभी युद्ध की खुद वकालत करे ये

अचानक शहीदों की बेवा बने ये

कभी गर्भ अनचाहा कचरे में बनकर

मिले है कभी भ्रूण कन्या का बनकर

निगाहों को मेरी रुलाता बहुत…

Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 11, 2017 at 9:30pm — 4 Comments

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