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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s Blog – September 2020 Archive (5)

हमने बाजी मार ली - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२२/२१२२/२१२२/२१२



खेत मन का एक  जोता  हमने बाजी मार ली

तन का सौदा रोक डाला हमने बाजी मार ली।१।

**

रेत पर लिख करके गुस्सा हमने बाजी मार ली

पत्थरों पर  प्यार  साधा  हमने  बाजी मार ली।२।

**

हर नदी की हर लहर पर पार जाना लिख दिया

मोड़ डाला रुख हवा  का  हमने बाजी मार ली।३।

**

छोड़  आये  चाँद  आधा  यूँ   सितारों के लिए

किन्तु  पहलू  में  है  पूरा  हमने  बाजी मार…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 24, 2020 at 6:30am — No Comments

शूल सम यूँ खुरदरे ही रह गये जीवन में सच-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२२/२१२२/२१२२/२१२



आँख से काजल चुराने का न कौशल हम में था

दूर रह कर  याद आने  का न कौशल हम में था।१।

**

नाम पेड़ों पर तो हम भी लिख ही लेते थे मगर

पुस्तकों में खत छिपाने का न कौशल हम में था।२।

**

दोस्ती  सूरज  सितारों  से   तो  अपनी थी गहन 

चाँद को लेकिन रिझाने का न कौशल हम में था।३।

**

पा  गये  विस्तार …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 23, 2020 at 7:00am — 12 Comments

बैठी हैं घर किये वहाँ अब तो रुदालियाँ -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२

कहने को जिसमें यार हैं अच्छाइयाँ बहुत

पर उसके साथ रहती हैं बरबादियाँ बहुत।१।

**

सजती हैं जिसके नाम से चौपाल हर तरफ

सुनते हैं उस  को  भाती  हैं तन्हाइयाँ बहुत।२।

**

कैसे कहें कि गाँव को दीपक है मिल गया

उससे ही लम्बी  रात  की परछाइयाँ बहुत।३।

**

पाँवों तले समाज को करके बहुत यहाँ 

चढ़ता गया है आदमी ऊँचाइयाँ बहुत।४।

**

बैठी हैं  घर  किये  वहाँ  अब  तो…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 14, 2020 at 7:30am — 4 Comments

कब धरती का दुख समझे - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२२२/२२२२/२२२२/२२२

जिनके धन्धे  दोहन  वाले  कब  धरती का दुख समझे

सुन्दर तन औ' मन के काले कब धरती का दुख समझे।१।

**

जिसने समझा थाती धरा को वो घावों को भरता नित

केवल शोर  मचाने  वाले  कब  धरती का दुख समझे।२।

**

ताल, तलैया, झरने, नदिया इस के दुख में सूखे नित

और नदी सा बनते नाले  कब धरती का दुख समझे।३।

**

पेड़ कटे तो बादल  रूठा  और  हवाएँ  सब झपटीं

ये सड़कों के बढ़ते जाले कब धरती का दुख समझे।४।

**

नित्य सितारों से गलबहियाँ उनकी तो हो…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 12, 2020 at 5:58am — 6 Comments

सितारे लौंग से कमतर नयन मृग से भी अच्छे हैं -गजल

१२२२/१२२२/१२२२/१२२२



अकेलेपन को भी हमने किया चौपाल के जैसा

बचा लेगा दुखों में  ये  हमें  फिर ढाल के जैसा।१।

**

भले ही दुश्मनी कितनी मगर आशीष हम देते

कभी दुश्मन न देखे बीसवें इस साल के जैसा।२।

**

इसी से है जगतभर में हरापन जो भी दिखता है

हमारे मन का सागर  ये  न  सूखे ताल के जैसा।३।

**

सितारे अपने भी जगमग न कमतर चाँद से होते

अगर ये भाग्य भी  होता  चमकते भाल के…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 10, 2020 at 7:42pm — 2 Comments

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