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शिज्जु "शकूर"'s Blog – September 2015 Archive (4)

अपने अपने हिस्से की हम लोग किस्मत ले गये- ग़ज़ल

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जब लिया इक दूसरे से हमने रुख़सत ले गये

अपने अपने हिस्से की हम लोग किस्मत ले गये



निस्बतों की अहमियत जो जानते थे लोग वो

याद अपनी दे गये हमसे मुहब्बत ले गये



ताक़ पर रिश्तों को रख जज़्बात बेच आये कहीं

आज तन्हा रह गये जो सिर्फ़ दौलत ले गये



अपनी वो मस्रूफ़ियत से एक लम्हा छोड़कर

पास बैठे दो घड़ी क्या मेरी फुरसत ले गये



वो हसद का एक शो’ला मेरे दिलमें डालकर

काम अपना कर दिया मेरी वजाहत ले गये



रोककर… Continue

Added by शिज्जु "शकूर" on September 24, 2015 at 6:36am — 16 Comments

पलट के फिर आयेंगी- शिज्जु

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पलट के फिर आयेंगी वो महक सबा वो सहर कभी न कभी

उदास न हो कि होगा हर इक दुआ का असर कभी न कभी



ये राह बहुत तवील सही, तू तन्हा ओ बेक़रार सही

मगर तुझे याद आयेगी ये घड़ी ये सफ़र कभी न कभी



यूँ हाथ के आबलों पे न जा, ज़बीं से टपकती बूंदें न देख

दिखेगा ज़रूर दुनिया को भी, तेरा ये हुनर कभी न कभी



पिघलने लगेंगे संगे-महक, तेरे तबो-ताब से किसी दिन

निकाल के लायेंगे यही पत्थरों से नहर कभी न कभी



फ़लक़ ये ज़मीन आबो हवा,… Continue

Added by शिज्जु "शकूर" on September 21, 2015 at 5:22pm — 12 Comments

नैतिकता की गिनती होती है सामानों में- ग़ज़ल

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नैतिकता की गिनती होती है सामानों में

व्यापार बना है अब रिश्ता हम इंसानों में



सिमट गई सारी दुनिया मोबाइल में लेकिन

बढ़ गई दूरी घर के बैठक औ’ दालानों में



छो़ड़ धरा उड़नेवालों याद रहे तुमको ये

शाख नहीं होती सुस्ताने को अस्मानों में



आकांक्षायें भूल गईं हैं रिश्तों को अब तो

स्वार्थ छुपा दिखता है लोगों की मुस्कानों में



मादा जिस्मों को तकती आवारा नज़रों को

धर्मों के रक्षक रक्खेंगे किन पैमानों… Continue

Added by शिज्जु "शकूर" on September 16, 2015 at 12:52pm — 9 Comments

मेरी भी दास्ताँ समझे कोई

1222 1222 12
मेरी भी दास्ताँ समझे कोई
मुझे इंसाँ यहाँ समझे कोई

मुहब्बत में तनाफ़ुर ढूँढ ले
मुझे फिर हमज़बाँ समझे कोई

दिखाता हूँ उजालों की तरफ़
ये कोशिश रायगाँ समझे कोई

मुझे भी दर्द होता है बहुत
तड़प मेरी कहाँ समझे कोई

जला के निकला हूँ इक शम्अ मैं
मगर आतिश-फिशाँ समझे कोई

(रायगाँ= व्यर्थ, आतिश-फिशाँ= ज्वालामुखी)

मौलिक व अप्रकाशित

Added by शिज्जु "शकूर" on September 6, 2015 at 2:47pm — 5 Comments

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