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Sheikh Shahzad Usmani's Blog – August 2016 Archive (4)

आस और प्यास (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

बात सिर्फ सूटकेस और नये कपड़े ख़रीदने की ही नहीं थी। हर बार मायके अकेले ही भेजना और भेजते समय बहस करना और लाड़ली बिटिया को देख-देख कर आंसू बहाना पत्नी को आज फिर अच्छा नहीं लग रहा था, सो मुँह फेर कर थोड़ी दूर बैठ गई।



"अब टसुये मत बहाओ, ये बताओ कि अबकी बार कितने दिन ज़ुल्म करोगी मुझ पर? मैं नहीं आऊँगा लेने, समझ लेना, जैसे जा रही हो, वैसे ही ज़ल्दी लौटना! भाईयों के अहसान मत लादना मुझ पर, समझीं!"- एक सांस में उसने अपने पुराने वाले संवाद बोल डाले, फिर नन्ही सी बिटिया को उसके कंधे से छीन कर… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on August 27, 2016 at 11:47pm — 10 Comments

किस-किस का लेवल? (लघुकथा)

अशासकीय विद्यालय की प्राचार्य महोदया ने आज फिर चार-पांच छात्रों को डांटते हुए दंडित किया। स्टाफ़-रूम में शिक्षकगण इसी विषय पर विमर्श कर रहे थे। एक शिक्षक ने उग्र हो कर कहा- "जिस स्कूल की प्राचार्य ही क्रोध में छात्रों को 'जानवर' या 'बिगड़ैल औलाद' कहे उस स्कूल की नौकरी ही छोड़ देना चाहिए या ऐसी प्राचार्य को उसके घर पर बिठा देना चाहिए!"



"बिलकुल सही कहा आपने! इतनी बात ही नहीं है, सर! अंग्रेज़ी बोलना सिखाना और उसके लिए प्रोत्साहित करना अलग बात है और उसके पीछे मातृभाषा, अपनी ही राष्ट्र भाषा… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on August 14, 2016 at 9:10pm — No Comments

अक्षदण्ड या दोस्त (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

होटल में बेहतरीन पार्टी सम्पन्न होने के बाद आयोजक नवांकुर रचनाकार ने पार्टी देने का राज़ खोलते हुए अपने मित्रों से कहा- "आज सालगिरह है मेरे लघुकथा विधा से परिचित होने की और मेरी पहली लघुकथा इन्टरनेट पर प्रकाशित होने की!"



"पार्टी तो बढ़िया रही मित्र! लेकिन मुझे तुम्हारी लघुकथायें तो हमेशा अधूरी कथायें ही लगीं! कुछ और लिखा करो यार!" एक साथी ने कटाक्ष करते हुए कहा।



"अधूरी नहीं मित्र, धुरी कथायें! लघुकथा का कथ्य धुरी का काम करता है; ज्वलंत सार्थक चिन्तन-मनन के लिए, समझे… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on August 8, 2016 at 7:32pm — 8 Comments

शब्दों का सैलाब (लघुकथा)/शेख़ शहज़ाद उस्मानी

विद्यालय के स्टाफ-रूम में शिक्षकगण लाल-स्याही की परम्परागत औपचारिक रस्म निभा रहे थे। उत्तर-पुस्तिकायें कई तरह से व्यवस्थित या अव्यवस्थित अपनी बारी की प्रतीक्षा में थीं। निर्धारित समय सीमा में उनको जांचने व मूल्यांकन करने का कार्य सम्पन्न करना था।



मानसिक दबाव सहते शिक्षकों में से एक ने कहा- "ये लाल कलम कब थमेगी?कब थमेगा यह सैलाब?"



दूसरे शिक्षक ने कहा- "शब्दों का मेला है, छल्ले डालो जनाब! आइने हैं बच्चों की ये उत्तर-पुस्तिकायें! जागो और जगाओ जनाब!"



तभी प्राचार्य… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on August 4, 2016 at 7:29pm — 11 Comments

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