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केवल प्रसाद 'सत्यम''s Blog – August 2013 Archive (13)

!!! मंदिरों की सीढि़यां !!!

!!! मंदिरों की सीढि़यां !!!

दर्द हृदय मे समेटे

नित उलझती,

आह! भरतीं

मंदिरों की सीढि़यां।

कर्म पग-पग बढ़ रहे जब,

धर्म गिरते ढाल से

आज मन

निश-दिन यहां

तर्क से

अकुला रहा।

घूरते हैं चांद.सूरज,

सांझ भी

दुत्कारती।

अश्रु झरने बन निकलते,

खीझ जंगल दूर तक।

शांत नभ सा

मन व्यथित है,

वायु पल-पल छेड़ती।

भूमि निश्छल

और सत सी

भार समरस ढो रही।

ठग! अडिग

अविचल ठगा सा,

राह…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on August 30, 2013 at 9:00am — 18 Comments

!!! कुण्डलियां !!!

!!! कुण्डलियां !!!

पत्थर जन मन धन चुने, जाति-पाति के संग।
इनके माथे पर लिखा, कामी-मत्सर-जंग।।
कामी - मत्सर - जंग, द्वेष का भाव बढ़ाते।
ढाई  आखर  छोड़,  धर्म  पर  रार  मचाते।।
निश-दिन करे कुकर्म, आड़ हो जन्तर-मन्तर।
बने  स्वयंभू  राम,  कर्म  का  डूबे  पत्थर।।

के0पी0सत्यम/मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on August 29, 2013 at 8:36am — 21 Comments

!!! यही ‘सत्यम’ शिवम् सुन्दर हुआ है !!!

!!! यही ‘सत्यम’ शिवम् सुन्दर हुआ है !!!

बह्र- 1222 1222 122

सकल दुनिया दिखाता जा रहा हूं।

कयामत का सफर सुलझा रहा हूं।।

मेरे मौला मैं तुझको क्या बताऊं,

रूहानी पीर के जैसा रहा हूं।

तेरी चौखट सदा मुझको लुभाती,

कभी तीखा कभी मीठा रहा हूं।

जहां में और भी गम हैं कहूं क्या?

जहां मेला वहीं तन्हा रहा हूं।

मेरी मां ने कहा था सुब्ह उठकर,

पिलाना आब, वो दरिया रहा हूं।

अमीरी छोड़ कर मुफलिस…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on August 28, 2013 at 10:13am — 19 Comments

!!! बने हम भोर-संध्या से!!!

!!! बने हम भोर-संध्या से!!!

विभा अब ढूंढ़ती किससे,

पढ़ाएं प्रेम की

पाती!

चपल सी आ गयी आभा,

चमकते शब्द

उपवन से।

पढ़ें पंछी, चहक चिडि़यां

धुनों में

गा रहे भौंरे।

कहे कोयल सुने सविता,

चमक कर

आ गयीं किरनें।

धरा पर छा गई मस्ती,

पवन इठला रही

उड़कर।

सुमन-शबनम मिली खिलकर,

गुलाबों की हसीं

बढ़कर।

बुलाती रोज दिनकर को,

हंसाती खूब

सर्दी में।

तराने ढ़ूढ़ते झरने,

उछलती

कूदती लहरें।

मिली मछली…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on August 25, 2013 at 12:43pm — 16 Comments

!!! प्यार में सौगात सावन !!!

!!! प्यार का सौगात सावन !!!

2122 2122 2122 212

प्यार का मौसम सुहाना, शोख सावन भा गया।

पड़ गए झूले सखी री, कजरी गायन भा गया।।1

मेघ बरसे भूमि सरसे, मोर - पंछी नाचते।

बाग उपवन खूब झूमे, वायु सनसन भा गया।।2

फूल-शबनम मिल खिले हैं, खुशुबुओ का साथ है।

मस्त तितली उड़ रही है, भौंरा गुनगुन भा गया।।3

मन बड़ा संशय भरा है, राह पिउ की देखती।

फिर झरा छप्पर-घरौंदा टीन टनटन भा गया।।4

क्यों? उदासी प्रेम पाती,…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on August 25, 2013 at 12:00pm — 16 Comments

!!! वंदना !!!

वंदना......हरिगीतिका

हे!  ज्ञान  दाती   दुःख  हरती   प्रेम  ममता   वारती।

यम नियम नियमन दिशा दर्शन गगन गुरूता धारती।।

तुम सर्व हो  तुम गर्व हो  तुम आदि  गंगा गामिनी।

रति सौम्य सागर सती आगर मोक्ष वरदं दायिनी।।1

रघुवीर पूजें  कृष्ण कूंजे  शक्ति दुर्गा  दामिनी।

अभिमान ऐसा क्लेष जैसा पाप शापं नाशिनी।।

अरि नष्ट करती मित्र बनती हाथ सिर पर फेरती।

सुख सार भरणी कष्ट हरणी तोष निश-दिन टेरती।।2

मैं मूर्ख जातं आत्म…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on August 22, 2013 at 7:52am — 22 Comments

!!! पिया के घर चली रजनी !!!

!!! पिया के घर चली रजनी !!!

गजल बह्र- 1 2 2 2, 1 2 2 2

सुहानी रात की रजनी,

सुमन सुख बेल सी रजनी।

बना है चांद दूल्हा जब,

सजी दुल्हन तभी रजनी।

चली बारात तारों की,

मगन आकाश सी रजनी।

करे परछन यहां आभा,

वहां सकुचा रही रजनी।

हवन आदित्य में पूरे,

किए फेरे जगी रजनी।

विदाई कर रहीं किरनें,

सिमट कर रो पड़ी रजनी।

किरन-आभा मिली जैसे,

फफक कर चीखती…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on August 21, 2013 at 8:46am — 14 Comments

!!! प्याज मंहगे आ गए !!!

!!! प्याज मंहगे आ गए !!!

बह्र- 2122 2122 2122 212

पत्थरों के शहर में ये जीव कैसे आ गए।

लोभ है सत्ता से इनको होड़ करके आ गए।।1

श्वेत पोशाकों में सजते, खून से लथपथ सने।

रोज मरते सत से राही, कंस जब से आ गए।।2

धर्म बीथीं भी हिली है, भू कपाती हलचलें।

भाई से भाई लड़े हैं, जाति जनने आ गए।।3

नफरतों की आग फैली, द्वेष फलते पीढि़यां।

अम्न जिंदा जल रही है, घी गिराने आ गए।।4

वक्त ने हमको पढ़ाया,…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on August 18, 2013 at 7:32am — 26 Comments

!!! बृज की बाला श्याम पुकारे !!!

बृज की बाला श्याम पुकारे, पिउ ज्यों रटे चकोर।

सावन है मन भावन अब तो,आजा मन के चोर।

बदरा बरसे रिमझिम हरषे, मन सरसै तन मोर।।

मेरी  करूण  सुने  बनवारी, मेह  बड़े  चितचोर।

बृज की बाला श्याम पुकारे, पिउ ज्यों रटे चकोर।।1

गोरी का साजन मन झूठा, कैसा यह परदेश।

जग के बन्धन-संशय भरते, तू सत्य अनमोल।।

तन की माटी तुझे बुलाए, भ्रम में करता शोर।

बृज की बाला श्याम पुकारे, पिउ ज्यों रटे चकोर।।2

जीवन बड़ा जुगाड़ु पग-पग, निश-दिन करता…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on August 13, 2013 at 10:30pm — 10 Comments

!!! गीत !!!

!!! गीत !!!



तुम राष्ट् के कर्णधार देवदूत हो,

यदि शांति का, मार्ग दर्शन कर सकोगे?

नित नये नूतन किसलय अरूणिमा में,

या सांझ की श्याम धुन बांसुरिया हो।

धूप भी चन्दन लगेगा दोपहरिया में,

राष्ट् को यदि कीर्ति गौरव दे सकोगे? 1

तुम मनुष्य हो कर्म का फल भूल जाओ,

देश-धर्म हित लड़ो स्व भूल जाओ।

प्यार की पवि़त्र गंगा हर कहीं हो,

राष्ट् को यदि एक भगीरथ दे सकोगे? 2

सत्यम आहिंसा प्रेमु धन खूब लुटाओ,

राजपथ का मार्ग…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on August 11, 2013 at 4:51pm — 14 Comments

!!! निरगुन !!!

!!! निरगुन !!!

मन है मेरा गंगा-जमुना,

तन वृन्दावन भाए।

नील गगन से नयनागर मे,

नटवर की छवि पाऊं प्रियतम!

नयन नीर छलकाए।

मन मन्दिर में मनमोहन सी,

मूरत सदा बसाऊं प्रियतम!

मन चंचल भरमाए।

सुध-बुध खोकर बुध्दि विचारूं,

ज्ञान-विराग लुटाऊं प्रियतम!

पग-पग नृत्य कराए।

निश-दिन तेरी ज्योति निहारूं,

लौ आत्मा से पाऊं प्रियतम!

यह तन दीप सुहाए।

प्रेम दया करूणाकर तुम हो,

सदा प्रेम…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on August 10, 2013 at 2:42pm — 22 Comments

!!! हरिगीतिका !!!

!!! हरिगीतिका !!!



2+3+4+3+4+3+4+5= 28

चौकल में जगण-121 अतिनिषिध्द है। चरण के अन्त में रगण-212 कर्ण प्रिय होता है।

जब मेघ बरसे रात तड़फे पीर है मन वेदना।

तन तीर धसती घाव करती राह निश-दिन देखना।।

अब आव प्रियतम भोर होती भ्रमर तन-मन छेदता।

रति-सुमन हॅसकर हास करती सुर्ख सूरज देवता।।1

चिडि़यां चहक कर तान कसती बांग मुर्गा टीसते।

बन-बाग-उपवन खूब झूमें मोर-दादुर रीझते।।

घर नीम छाया धूप माया उमस करती ताड़ना।

नय नीर छलके भाव बहके…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on August 8, 2013 at 9:45pm — 18 Comments

!!! हाथ नर मलता गया है !!!

!!! हाथ नर मलता गया है !!!

बह्र-----2122  2122

भोर जो महका गया है।

सांझ को उकसा गया है।।

रास्ते का ढीठ पत्थर,

पैर से टकरा गया है।

चोट लगती दर्द होता,

आह पहचाना गया है।

ऐ खुदा अब तो बता दे!

राह क्यों रोका गया है?

जान कर अति दर्द उसका,

आंख जल ढरका गया है।

हाय ये तकदीर खेला,

खेल कर घबरा गया है।

कल यहां यमराज देखो,

काल को धमका गया…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on August 5, 2013 at 8:00pm — 16 Comments

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