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नाथ सोनांचली's Blog – August 2017 Archive (3)

आल्हा (वीर छंद) पर प्रथम प्रयास

लाख करूँ मैं कोशिश फिर भी, कभी न लिख पाऊँ श्रृंगार|

कलम उठाऊँ लिखने को जब, शब्दो में बरसे अंगार||

गीत तराने जब जब सोचू, दिख जाते बेबस लाचार|

छन्द ग़ज़ल तब मुझे चिढ़ाते, हिय में उठता हाहाकार||



बोल चाल के शब्द चुनूँ मैं, उन शब्दो से करू धमाल|

नही जमीर बिकाऊँ मेरा सत्ता का मै नही दलाल||

निडर भाव से सत्य लिखू मैं, करूँ झूठ को सदा हलाल|

अगर किसी ने आँख दिखाई, पल में लू मैं आँख निकाल||



भावों में तब ज्वाला भड़के, जब देखूँ बेहाल किसान||

अन्न… Continue

Added by नाथ सोनांचली on August 28, 2017 at 5:29pm — 8 Comments

सियासत पर दो मुक्तक

सियासत मुल्क़ की यारों लहू पीने की आदी है
निवाला छीन भूखों का पहनती आज खादी है
किसे अच्छा कहूँ मैं अब सभी का हाल इक जैसा
बना है रहनुमा वो आज जो खुद ही फ़सादी है |1|

अगरचे दिल सियासत से बहुत नाशाद है अपना
नहीं लगता दयार-ए-हिन्द ये आबाद है अपना
उठेगी गर वतन में अब किसी निर्दोष की मय्यत
कहेगा कौन किस मुंह से वतन आज़ाद है अपना |2|

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by नाथ सोनांचली on August 18, 2017 at 5:00am — 9 Comments

राखी पर्व पर् कुण्डलिया

कच्चे धागे से जुड़ा, राखी का त्यौहार

मिले बहन जब भ्रात से, बरसे स्नेह अपार

बरसे स्नेह अपार, बहन जब बाँधे राखी

जगता सात्विक भाव, उड़े मन जैसे पाखी

रेशम की यह डोर, पहनते बूढ़े बच्चे

रिश्ते बने प्रगाढ़, भले हों धाँगे कच्चे



आये सावन मास में, रक्षाबंधन पर्व

बहना दे शुभकामना, भाई करता गर्व

भाई करता गर्व, बहन जो घर पर आती

हर बहना ऱक्षार्थ, वचन भाई से पाती

रहे बहन सुरक्षित, पर्व सबको बतलाये

बहे नेह की धार, यहाँ जब सावन आये



राखी के… Continue

Added by नाथ सोनांचली on August 7, 2017 at 7:30am — 6 Comments

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