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Sheikh Shahzad Usmani's Blog – July 2018 Archive (8)

ऊपरवालों से गठजोड़ - (लघुकथा)

"जो भी हो रहा है, हमारे पक्ष में अच्छा ही हो रहा है! बस, थिंक पॉज़िटिव! तीखे बयानों, वायरल अफ़वाहों और चुनौतियों से डरने की कोई ज़रूरत नहीं है!" एक वरिष्ठ ज़िम्मेदार नेता ने गोपनीय सभा में अपने साथियों से कहा - "अपने पक्ष में लहर बरकरार रखने के लिए विरोधी दलों की सत्ता वाले इलाक़ों में बदलते हालात पर गिद्धों जैसी नज़र रखो! सदैव अलर्ट रहो और हर अवसर को पकड़ कर अपने दल के पक्ष में बस तुरंत ही कुछ पॉज़िटिव सा करते रहो साम-दाम-दंड-भेद और चाणक्य जैसी नीतियों के साथ! पुलिस से भी डरने की ज़रूरत नहीं है,…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on July 30, 2018 at 4:30am — 9 Comments

'अद्भुत, अविश्वसनीय, अकल्पनीय (अतुकांत कविता)

सबको तो

डस रहे हैं, फंस रहे हैं

असरदार या बेअसर?

नकली या असली?

देशी, विदेशी या एनआरआई?

मुंह में सांप

हाथों में सांप

बदन में सांप

गले पड़े सांप

सिर पर सांप

सांपों के तालाबों से!

मानव समाज में

शब्दों, जुमलों, नारों,

फैशन, गहने या हथियार रूपेण!

या प्रतिशोध लक्षित

मानव-बम सम!

पर कितना असर

जनता पर, सरकार पर?

केवल घायल लोकतंत्र

सपेरों के मंत्र

यंत्र, इंटरनेट

और सोशल मीडिया!

पनीले या…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on July 22, 2018 at 12:00pm — 2 Comments

रिलेशनशिप (लघुकथा)

"मां, मुझे क्षमा कर दो और घर चलो!"

"क्षमा क्यों? तुमने भी वही किया जो सभी मर्द ऐसे हालात में करते हैं! ... यह बात और है कि तुम इतनी कम उम्र में पूरे पुरूष बन गये और एक विधवा पर वैसे ही बोलों के पत्थर फैंकने लगे!"

"लेकिन मेरे बड़े भाई ने हमेशा तुम्हारा ख़्याल रखा, तुम्हारा ही बचाव किया न!"…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on July 21, 2018 at 11:30pm — 8 Comments

जनता जस-की-तस! (छंदमुक्त/अतुकांत कविता)

विश्वास-अविश्वास की बहस

जगहंसाई के रहस्य

फ़िल्मी रस

लोकतंत्र को डस

संस्कार तहस-नहस

रो ले , सो ले या बस हंस!

जनता जस-की-तस!

*

अचरज ही अचरज

वर्षों पुराना मरज़

डीलें संवेदनशील

अपनों को बस लील

ग़रीबों पर तरस

धन अमीरों पर बरस

फ़िल्मी रस

व्यवस्था तहस-नहस!

मतदाता जस-का-तस!

*

राज़ों का संत्रास

हिलते स्तंभों के आभास

धर्म-गुरुओं के दास

बदले राजनीति के अंदाज़

जनता पर ग़ाज़

गप्पों की झप्पी

विवादों की…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on July 20, 2018 at 7:58pm — 8 Comments

'स्वावलंबन, भारतीयता या आज़ादी' (लघुकथा)

अपने इस मुकाम पर वह अब अपनी डायरी और फोटो-एलबम के पन्ने पलट कर आत्मावलोकन कर रही थी।

"सांस्कृतिक परंपरागत रस्म-ओ-रिवाज़ों को निबाहती हुई मैं सलवार-कुर्ते-दुपट्टे से जींस-टॉप के फैशन की चपेट में आई और फिर आधुनिक कसी पोशाकों को अपनाती हुई वाटर-पार्क व स्वीमिंगपूलों के लुत्फ़ लेती हुई अत्याधुनिक स्वीमिंग सूट तक पहुंच ही गई!" तारीख़ों पर नज़रें दौड़ाती हुई एक आह सी भरती हुई उसने अपनी आपबीती पर ग़ौर फ़रमाते हुए अपने आप से कहा - "ओह, धन-दौलत और नाम कमाने की लालच में फैशनों का अंधानुकरण…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on July 14, 2018 at 7:27pm — 8 Comments

'दो सितारों का मिलन' (लघुकथा)

"हैलो! आदाब! ठीक तो हैं न! कहां तक पहुंच गईं आप? ज़रा अपनी घड़ी साहिबा पर भी इक नज़र तो डालियेगा!" शायर 'राज़' साहिब ने साहित्यिक सम्मेलन परिसर के मुख्य द्वार पर अगली सिगरेट का अगला लम्बा कश लेते हुए मोबाइल फ़ोन पर एक बार में ये सवाल दाग़ दिये!



"आदाब राज़ साहिब! मैं वहीं हूं अपनी क़लम संग, जहां मुझे इस वक़्त होना चाहिए!" दूसरी तरफ़ से चिर-परिचित सुरीली आवाज़ में सोशल मीडिया की आभासी सहेली शायरा शबाना ने आश्चर्य-मिश्रित लहज़े में कहा - "माना कि आप घड़ी नहीं पहनते, लेकिन अपने मोबाइल पर मेरे…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on July 8, 2018 at 9:19pm — 6 Comments

'गुड टाइम, बैड टाइम' (लघुकथा)

"अब तो बता दो कि 'गुड टेररिज़्म (आतंकवाद)' और 'बैड टेररिज़्म' में वाक़ई क्या फ़र्क है?" एक धर्मावलंबी ने कहा।



"वही फ़र्क है न, जो इंसां की ज़िन्दगी में 'गुड टाइम' और 'बैड टाइम' में है; जो 'गुड ह्यूमन' और 'बैड ह्यूमन' के बीच में है!" दूसरे ने जवाब दिया।



"जी नहीं, अंतर वही है, जो 'गुड ह्यूमन' के 'बैड टाइम' और 'बैड ह्यूमन' के 'गुड टाइम' के बीच में है!" एक हारे हुए परेशां शिक्षित बेरोज़गार ने अपनी पथराई आंखों से दो बूंदे टपकाते हुए कहा - "नासमझी या दुर्भाग्य से 'गुड टाइम' किसी…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on July 7, 2018 at 6:30pm — 2 Comments

'समय तू ढर्रे-ढर्रे मत चल' (लघुकथा)

"मैं ... मैं समय हूँ!"



"चुप कर यह "मैं .. मैं" ! मालूम है कि तू समय है और इस सृष्टि का सब कुछ मय समय है तय समय में!" विज्ञान और तकनीक ने एक स्वर में व्यंग्य किया।



"लेकिन तू कितनी भी फुर्ती से कहीं से भी फिसल ले, तुझे अपनी हथेली में किसी कठपुतली की तरह नचा सकते हैं हम, भले मुट्ठी में तुझे क़ैद न कर सकें, समझे!" 'तकनीक' ने 'विज्ञान' के कंधों पर टांगें पसारते हुए आगे की तरफ़ क़दमताल कर अपनी हथेली दिखा कर पलटाते हुए कहा।



"इतने आत्ममुग्ध मत हो! जीत-हार,…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on July 6, 2018 at 9:59am — 5 Comments

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