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Manan Kumar singh's Blog – July 2015 Archive (5)

गजल

गजल
2212 2212
हर बार मजहब मत उठा,
नाचीज यह गजब मत ढा।
जो हो न कुछ,खबर न सजा,
आका, कभी रहवर न बना।
रोटी पकी, अब चुप रहो,
जनता जली,जन को न जला।
झंडे उठा तू था गया,
दे कर उसे, तूने छला।
मजहब भला करता कि वह
हरदम रहा मरता चला?
ढोते रहे बस भार-से,
ईमान तो उनकी बला।
सुना कि मानेंगे सभी
मजहब,कभी बातें भला?
'मौलिक व अप्रकाशित'@मनन

Added by Manan Kumar singh on July 31, 2015 at 12:03am — 2 Comments

गजल

भ्रमर,कली से---गजल

2122 2122 2122 212

सोचता हूँ क्या कली की बंदगी का नाम दूँ?

कह गया हूँ मैं बहुत, लो आ तुझे पैगाम दूँ।

रूप की आराधना हो साधना यह कामना,

इश्क करना चाहिये मैं नाम और इनाम दूँ।

घूम आया हर गली मैं बात प्यारी गुनगुना,

अब न टूटें दिल कभी यह देख मैं पैगाम दूँ।

राग-रस की कामना अनुरागियों की प्रीत है,

तू बसी मन में हमारे, और कौन मक़ाम दूँ?

रात तेरी, दिन तुझे री सुबह तुझको शाम दूँ,

पंखुड़ी के होंठ तेरे गीत उनके नाम दूँ।

कह रहे सब… Continue

Added by Manan Kumar singh on July 30, 2015 at 8:49am — 4 Comments

गजल

दर्द होता अब नया है
मर्ज तू ही,तू दवा है।
बात तेरी पुरशकूं बस,
और सारी तो हवा है।
बादलों से माँगकर,लो
बेखुदी मन दे गया है।
ओढ़ ले या ले पहन तू
वक्त तेरा हो गया है।
मेघमाला सी बरस तू
खेत धानी रो रहा है।
देख तेरा ही जगाया,
अब सपन भी सो गया है।
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

Added by Manan Kumar singh on July 27, 2015 at 12:30pm — 4 Comments

हो गया सागर लबालब अब उफनना चाहिए, (गजल)

2122 2122 2122 212



हो गया सागर लबालब अब उफनना चाहिए,

चल रहा मंथन बहुत कुछ तो निकलना चाहिए।



आग यह कबसे दबायी है अभी अंतर सुनो,

कब तलक सुलगे उसे अब तो धधकना चाहिये।



बेइमां अब साहिबां सब क्यूँ हमारे हो गये?,

आज एक उनमें कहीं वाजिब निकलना चाहिये।



है सड़क से राह ले जाती सियासत तक अभी,

अब तुझे भी आप ही घर से निकलना चाहिये।



ले गये सब मोड़ते नदियाँ कहाँ ये बावरे?

इक नदी का रुख अभी भी तो बदलना चाहिये।…



Continue

Added by Manan Kumar singh on July 26, 2015 at 7:30am — 13 Comments

गीतिका(मनन कु सिंह)

गीतिका(मात्रा भार-20 मात्राएँ)

हम यादों की बाती जलाते रहे।

तुम यादों के दीपक बुझाते रहे।

हम यादों के सपने सजाते रहे,

तुम सपनों की अर्थी उठाते रहे।

हम सपनों की मूरत बनाते रहे,

तुम मूरत की सूरत छिपाते रहे।

हम सपनों की सूरत दिखाते रहे,

तुम सूरत से अपनी लजाते रहे।

हम बातें वो लिखकर बताते रहे,

तुम बातें भी अपनी मिटाते रहे।

हम नज़रों में तुमको बिठाते रहे,

तुम नज़रों से दूरी बनाते रहे।

तुम बरसे भी कहाँ,बस छाते रहे,

तुम सूखी-सी रेती… Continue

Added by Manan Kumar singh on July 19, 2015 at 7:30pm — 6 Comments

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