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SANDEEP KUMAR PATEL's Blog – July 2013 Archive (10)

आज का प्रेम

की बोर्ड से चिपका
स्क्रीन की सुंदरता से मुग्ध
हर सवाल का जबाब
चेट्टिंग से चेट्टिंग तक
मोबाइल से चीटिंग करते
झूठ से भरमाते
फिर भी मुस्कुराते
आँखें कान नाक
सब अंधे
जिनसे हमेशा
रिसता है
ज़हरीला  
फरेब
ऐसे रिश्ते

प्रेम की पराकाष्ठा है  
आज का प्रेम


संदीप पटेल "दीप"

मौलिक व अप्रकाशित

Added by SANDEEP KUMAR PATEL on July 17, 2013 at 3:09pm — 9 Comments

आज कुर्सी पे बैठा तो रब हो गया

देश में कैसा बदलाव अब हो गया
नंगपन है रईसी ग़ज़ब हो गया  

जबसे इंग्लिश मदरसे खुले, बाप और  
माँ को आँखें दिखाना अदब हो गया

हाथ जोड़े थे जिसने कभी वोट को
आज कुर्सी पे बैठा तो रब हो गया

अब गधों की फ़तह, मात घोड़ों की हो
दौर दस्तूर कैसा अजब हो गया  

हर्फ के कुछ उजाले लुटा प्यार से   
"दीप" खुर्शीद सा जाने कब हो गया

संदीप पटेल "दीप"

(मौलिक व अप्रकाशित)  

Added by SANDEEP KUMAR PATEL on July 16, 2013 at 4:01pm — 8 Comments

सलवटें करवटें औ याद सहर से पहले

मिली हैं करवटें औ याद सहर से पहले

पिए हैं इश्क़ के प्याले जो जहर से पहले  



जो दिल के खंडहर में अब बहें खारे झरने  

यहाँ पे इश्क की बस्ती थी कहर से पहले



ग़ज़ब हैं लोग खुश हैं देख यहाँ का पानी

नदी बहती थी जहाँ एक नहर से पहले



कहाँ उलझा हुआ है गाफ़ अलिफ में अब तक

रदीफ़ो काफिया संभाल बहर से पहले



नहीं आसां है उजालों का सफ़र भी इतना  

जले है दीप सारी रात सहर से पहले



संदीप पटेल "दीप"…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on July 16, 2013 at 2:30pm — 6 Comments

भोर

ये भोर

काली रात के बाद



अब भी सिसकती है

यादों के ताजे निशाँ

सूखे ज़ख़्मों को

एक टक ताकती  



उसे नहीं पता

आने वाली शाम और

रात कैसी होगी



पता है तो बस

बीता हुआ कल

वो बीता हुआ कल  

जो निकला था

उसकी कसी हुई मुठ्ठी से

रेत की तरह

देखते देखते

रेत की तरह

भरी दोपहर में

तपते रेगिस्तान में

ज्यों छलती है रेत

मृग मारीचिका की तरह



मृग मारीचिका

जिससे भान होता है

पानी का

हाँ…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on July 12, 2013 at 1:54pm — 9 Comments

प्रचंड गंग धार यूँ बढ़ी बहे बड़े बड़े

प्रचंड गंग धार यूँ बढ़ी बहे बड़े बड़े

बहे विशाल वृक्ष जो थे उंघते खड़े खड़े  



बड़ी बड़ी शिलाओं के निशान आज मिट गये

न छत रही न घर रहा मचान आज मिट गये

हुआ प्रलय बड़ा विकट किसान आज मिट गये

सुने किसी की कौन के प्रधान आज मिट गये



पुजारियों के होश भी लगे हमें उड़े उड़े

प्रचंड गंग धार यूँ बढ़ी बहे बड़े बड़े



मदद के नाम पे वो अपने कद महज बढ़ा रहे

खबर की सुर्ख़ियों का वो यूँ लुत्फ़ भी उड़ा रहे

वहीं घनेरे मेघ काले छा के फिर चिढ़ा…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on July 12, 2013 at 12:28pm — 9 Comments

काश तुम बोलते

भुन्सारे से संझा तक  

घूरे की तरह

उदास

चन्दा घिरा है

काले बादलों में

भरी दोपहर में !!!



सारी रोशनी

खाए जा रहा है

पलकों का बह चुका

काला कलूटा काजल



काश तुम बोलते

ये मौन चिरैया की चुप्पी तोड़ते

गुस्सा लेते

कम से कम कारण तो पता चलता

आँखों से और इन अदाओं से

पता चलता है

प्यार और तकरार

प्यास और इंतज़ार

ईमानदार और मक्कार का



तमन्ना का नहीं

 

अब देखो न …

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on July 11, 2013 at 4:00pm — 7 Comments

इक्षाओं की अविरल नदिया दिल में सदा मचलती है

सुख के झरने देख पराए दुख को लिए निकलती है

इच्छाओं की अविरल नदिया दिल में सदा मचलती है



मर्यादा में घोर निराशा

बाँध तोड़ती अहम पिपाशा

रस्मों और रिवाजों के पुल  

लगते हैं बस एक तमाशा  



तीव्र वेग से बहती है कब शिव से कहो सम्हलती है

इच्छाओं की अविरल नदिया दिल में सदा मचलती है

अंतरमन का दीप बुझाती

प्रतिस्पर्धा को सुलगाती

होड़ लिए आगे बढ़ने की

लक्ष्य रोज ये नये बनाती



सुधा धैर्य की छोड़ विकल चिंता का गरल…

Continue

Added by SANDEEP KUMAR PATEL on July 11, 2013 at 3:00pm — 13 Comments

भारत की अस्मत लुटने तक क्यूँ सोते हो सत्ताधारी

भारत की अस्मत लुटने तक क्यूँ सोते हो सत्ताधारी



भाषण में झूठे वादों से

अपने नापाक इरादों से

तुम ख्वाब दिखाके उड़ने के

खुद बैठे हो सैयादों से



बस नोट, सियासी इल्ली बन, तुम बोते हो सत्ताधारी   

भारत की अस्मत लुटने तक क्यूँ सोते हो सत्ताधारी



हर ओर मुफलिसी फांके हों  

यूँ रोज ही भले धमाके हों

कागज़ पे सुरक्षा अच्छी है

इस पर भी खूब ठहाके हों



पहले तो खेल सजाते हो फिर  रोते हो सत्ताधारी

भारत की अस्मत लुटने तक…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on July 8, 2013 at 3:30pm — 7 Comments

कुछ झोपड़ों को रोंद के जो घर बना रहा

कुछ झोपड़ों को रोंद के जो घर बना रहा

इस दौर में वो सख्स ही मंजिल को पा रहा

 

जितना नहीं है पास में उतना लुटा रहा

कितना अमीर है ग़मों में मुस्कुरा रहा 

 

अपनी ही गलतियों के हैं कांटे चुभे हमें

वरना सफर तो जिन्दगी का गुलनुमा रहा

 

कहने का शौक औ जुनूं उसका न पूछिए

बेबह्र भी कही ग़ज़ल वो गुनगुना रहा

 

शायद शहद झड़े है उसकी बात से यहाँ

इक झुण्ड मक्खियों सा क्यूँ ये भिनभिना रहा  

 

जब मुल्क में…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on July 3, 2013 at 5:46pm — 7 Comments

तो बंजरों में ही कश्ती चलाना अच्छा है

ग़मों में आपका यूँ मुस्कुराना अच्छा है

हंसी लबों पे रक्खे गम छुपाना अच्छा है  

 

कोई कभी जो पूछे है सबब यूँ हंसने का  

छुपा के चश्मेतर तो खिलखिलाना अच्छा है

 

मुझे तो हर घडी ये गलतियाँ बताता रहा

कोई कहे बुरा चाहे ज़माना अच्छा है

 

ग़ज़ब हैं खेल ये तकदीर के किसे क्या कहें  

खुद अपने आप से ही हार जाना अच्छा है

 

वो जिसकी चोट से दिल जार जार रोया था

उसी की राह से पत्थर उठाना अच्छा है

 

महल न…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on July 1, 2013 at 6:17pm — 17 Comments

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