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Ravi Prakash's Blog – July 2013 Archive (8)

प्रेम के कवित्त - (रवि प्रकाश)

1.धार तू,मझधार तू,सफ़र तू ही,राह तू,

घाव तू,उपचार तू,तीर भी,शमशीर भी।

जाने कितने वेश है,दर्द कितने शेष हैं,

गा चुके दरवेश हैं,संत ,मुर्शिद,पीर भी।

ध्वंस किन्तु सृजन भी,भीड़ तू ही,विजन भी,

छंद है स्वच्छन्द किन्तु,गिरह भी,ज़ंजीर भी।

भाग्य से जिसको मिला,उसे भी रहता गिला,

पा तुझे बौरा गए,हाय,आलमगीर भी॥

 

 

2.डूब चले थे जिनमें,उनसे ही पार चले,

जिनमें थे हार चले,वो पल ही जीत बने।

कितने साँचों में ढले,सारे संकेत तुम्हारे,

कुछ ग़ज़लों…

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Added by Ravi Prakash on July 29, 2013 at 8:00am — 9 Comments

मन तक आना शेष रहा - (रवि प्रकाश)

मैंने बस धीरज माँगा था,तुमने ही अधिकार दिया;

कितने पत्थर रोज़ तराशे,फिर मुझको आकार दिया।

बादल,बरखा,बिजली,बूँदें,क्या कुछ मुझमें पाया था;

पथ-भूले को इक दिन तुमने,दिग्दर्शक बतलाया था।

लेकिन मेरे पथ पर चलना,श्रद्धा लाना शेष रहा।

धड़कन के दरबान बने तुम,मन तक आना शेष रहा॥

आशा को थकन नहीं होती,इच्छा को विश्राम कहाँ;

जब तक साँसों में उष्मा है,जीवन को आराम कहाँ।

कण-कण जमते हिमनद में भी,बाक़ी रहता ताप कहीं;

मनभावन आलिंगन में भी,छू जाता संताप…

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Added by Ravi Prakash on July 27, 2013 at 5:30pm — 7 Comments

ग़ज़ल - (रवि प्रकाश)

-एक दुधमुँहा प्रयास-

बहर -ऽ।ऽऽ ऽ।ऽऽ ऽ।ऽऽ ऽ।ऽ

.

पाँव कीचड़ से सने हैं और मंज़िल दूर है।

शाम के साए घने हैं और मंज़िल दूर है॥



तुम मिलोगे फिर कहीं इस बात के इम्कान पे,

फास्ले सब रौंदने हैं और मंज़िल दूर है॥

कौन हो मुश्किलकुशा अब कौन चारागर बने,

घाव ख़ुद ही ढाँपने हैं और मंज़िल दूर है॥

कल बिछौना रात का सौगात भारी दे गया,

अब उजाले सामने हैं और मंज़िल दूर है॥

धड़कनें भी मापनी हैं थामनी कंदील भी,

रास्ते…

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Added by Ravi Prakash on July 24, 2013 at 10:30pm — 14 Comments

प्यार और मनुहार - (रवि प्रकाश)

अधिकार भरी मादकता से,दृष्टिपात हुआ होगा;

मन की अविचल जलती लौ पर,मृदु आघात हुआ होगा।



साँसों की समरसता में भी,आह कहीं फूटी होगी;

सूरज के सब संतापों से,चन्द्रकिरण छूटी होगी।

विभावरी ने आते-जाते,कोई बात सुनी होगी;

सपनों ने तंतुवाय हो कर,नूतन सेज बुनी होगी।

कितने पल थम जाते होंगे,बंसीवट की छाँव तले;

मौन महावर पिसता होगा,आकुलता के पाँव तले।



सन्ध्या का दीप कहीं बढ़ कर,भोरों तक आया होगा;

मस्तक का चंदन अनायास,अलकों तक छाया होगा।…



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Added by Ravi Prakash on July 23, 2013 at 12:00pm — 7 Comments

मुक्तक - (रवि प्रकाश)

वज़न-।ऽऽऽ ।ऽऽऽ ।ऽऽऽ ।ऽऽऽ



1. नहीं शिकवा नज़ारों से अगर नज़रें फिसल जाएँ,

भले ख़ामोश आहों में सुहाने पल निकल जाएँ।

तेरी मग़रूर चौखट पे नहीं मंज़ूर झुक जाना,

हमेशा का अकेलापन भले मुझ को निगल जाए॥

.

2. तुम्हारे रूप की गागर न जाने कब ढुलक जाए,

चटख रंगीनियों में भी पुरानापन झलक जाए।

मगर मेरी मुहब्बत तो सदानीरा घटाएँ है,

वहीं अंकुर निकलते हैं जहाँ पानी छलक जाए॥

.

3. किसी जुम्बिश में धड़कन के अभी अहसास बाक़ी है,

अपरिचित आहटों में भी तेरा…

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Added by Ravi Prakash on July 20, 2013 at 7:00am — 15 Comments

मेरी कविते ! (रवि प्रकाश)

चाँद नगर को जाते-जाते,जिनका अश्व भटकता है;

उडुगण की उजली बस्ती में,चुँधियाया सा रुकता है।

स्वर्णकिरण की राहों पर जो,चलते हुए झिझकते हैं;

जिनके स्वप्न जहाँ विस्फारित,होते वहीं पिघलते हैं।

नीरदमाला बन कर उनके,निःश्वासों में गलना है।

मेरी कविते! साथी हो कर,हमको दूर निकलना है॥

जग में चौराहे कितने हैं,कितनी परम्पराएँ भी;

बनती-मिटती बस्ती भी है,अडिग अट्टालिकाएँ भी।

जीवन भर दोराहे पर जो,पथ-निर्धारण करते हैं;

आशा की कच्ची गागर में,सदा हताशा भरते हैं।…

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Added by Ravi Prakash on July 18, 2013 at 7:00am — 8 Comments

कितना तुमको जीना है //रवि प्रकाश (Kitna Tumko Jeena Hai By Ravi Prakash)

सदियाँ बीत गई हैं फिर भी,जीने का आधार नहीं;

धड़कन लीक बदलती है पर,सांसों में आभार वही।

गरमी के खेमे उठ जाते,अगले पल में रिमझिम है;

जग के झूठे व्यापारों में,परिवर्तन ही अन्तिम है।

दुख की दीवारें पक्की हैं,सुख का परदा झीना है।

अपने में ही सब कुछ हो कर,कितना तुमको जीना है॥

सागर होना बहुत सरल है,नदिया बन गाना मुश्किल;

शिखरों सा उठना संभव है,गल कर बह जाना मुश्किल।

छाले भी सहलाने होंगे,गिरती-पड़ती राहें हैं;

सुर में गा पाना बहुत कठिन,स्वर में तपती आहें… Continue

Added by Ravi Prakash on July 16, 2013 at 6:00am — 14 Comments

गंगे ! (रवि प्रकाश)

माँ वो है-

जो जन कर जुड़ जाती है

चेतना के अंधकूपों में भी

अपने जने का करती है पीछा,

एक सूत्र बन कर संतति से हो जाती है तदाकार,

पालना ही जिसका

सार्वत्रिक,सार्वभौमिक और शाश्वत संस्कार;

शायद इसीलिए हमारे

उन दिग्विजयी पड़दादाओं ने

तेरे कगारों पर दण्डवत कर के

उर्मिल जल की

अँजुरी भर के

कोई संकल्प किया था

और बुदबुदाये थे कितने ही मंत्र अनायास

तुझे माँ कह कर।

वो शायद आदिम थे

इसीलिए भ्रमित थे,असभ्य थे

और हम सभ्य…

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Added by Ravi Prakash on July 13, 2013 at 5:30pm — 10 Comments

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