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प्रो. विश्वम्भर शुक्ल's Blog – June 2013 Archive (17)

एक बंजर व्योम तो हम पर तना है !

अपरिचय, संवेदना है, भावना है ,

उसे क्या जो पुष्प से पत्थर बना है !



मिले उनको हर्ष के बादल घनेरे ,

एक बंजर-व्योम तो हम पर तना है !



चित्र है उत्कीर्ण कोई चित्त पर ,

ठहर जाती जहां जाकर कल्पना है !



सूर्य की ये रश्मियाँ बंधक बनीं हैं 

एक अंधी कोठरी मे ठहरना है !



रास्ते अब स्वयं ही थकने लगे हैं 

पूछता गंतव्य मन क्यों अनमना है ?



_______________________प्रो. विश्वम्भर…

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Added by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on June 30, 2013 at 10:57pm — 22 Comments

गीतिका ~

शौक है , अजीब लगता है,

दर्द कोई  रकीब लगता है !

रोज तरसा है मुस्कुराने को 

चेहरे-चेहरा गरीब लगता है !

ये गम हैं कि छोड़ते ही…

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Added by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on June 29, 2013 at 7:30pm — 11 Comments

दोहे : देवभूमि का दर्द !

भक्तों के मुख मलिन हैं ,पूजा-गृह में गर्द ,

प्रभु अपने किससे कहें देव-भूमि का दर्द !



हुई न ऐसी त्रासदी जैसी है इस बार ,

प्रभु ने झेली आपदा बदरी क्या केदार !



बादल,बारिश,मृत्यु के कारण बने पहाड़ ,

धरती काँपी,मनुज के थर-थर काँपे हाड़…

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Added by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on June 24, 2013 at 10:30pm — 13 Comments

हाइकू ज़िंदगी के ~

ज़िंदगी भली 

रुलाती भी है कभी 

करमजली !

~

~…

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Added by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on June 23, 2013 at 10:30pm — 7 Comments

बैठे-ठाले ~~

हेलीकाप्टर से उड़ान हुई ,

संवेदना उनकी महान हुई !



घूमे ,फिरे ,खेले ,खाए ,

किस कदर थकान हुई !



ये जो मौत के मंज़र देखे,

कुदरत है ,मेहरबान हुई…

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Added by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on June 22, 2013 at 11:00pm — 9 Comments

एक नवगीत ~~

एक निर्झर नदी सी बहो 

खिलखिलाती हुई कुछ कहो 

फासले अब नहीं दरमियां 

आंच है,उम्र है,गरमियां

अब तो सम्बन्ध हैं इस तरह 

जैसे हों झील में मछलियां 



थाम लेंगे…

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Added by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on June 22, 2013 at 12:23am — 7 Comments

गीतिका : आह पानी ,वाह पानी !

ये आह पानी ,वो वाह पानी ,

कर गया आखिर तबाह पानी !



कभी बादलों से रही शिकायत ,

जिधर डालिए अब निगाह पानी !



दिखे ऐसे मंजर,उतराती लाशें

उठे दर्द,चीखें,कराह पानी !



जहां ज़िंदगी मांगने को गए थे,

कर के गया सब सियाह पानी !



रहम करनेवाला खुद ही परीशां

माँगी है तुझसे पनाह पानी !



____________प्रो.विश्वम्भर शुक्ल ,लखनऊ



(मौलिक और अप्रकाशित…

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Added by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on June 20, 2013 at 11:00pm — 10 Comments

गीतिका ~

ज़िंदगी किताब ,आइये पढ़ें 

दर्द बे-हिसाब,आइये पढ़ें 

हंसते चेहरों पे जमी गर्द 

आँखों में सैलाब ,आइये पढ़ें 

सिर्फ काँटों की…

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Added by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on June 19, 2013 at 10:30pm — 8 Comments

बैठे-ठाले ~~

आह करते हैं ,वाह करते हैं 

लोग हैं बस ,तबाह करते हैं 

रख के नफरत चाशनी में वो …

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Added by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on June 18, 2013 at 11:00pm — 11 Comments

मुक्तक

कभी हम यूँ भी अकेले होंगे ,

भीड़ होगी ,तन्हाई के मेले होंगे ,

याद आएगा एक वह आँगन 

जिसमे हम मौज से खेले होंगे !

*

आंधियां,तूफ़ान हों ,ये चाहते हैं हम,…

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Added by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on June 17, 2013 at 11:12pm — 12 Comments

हाइकू बरसात के

लो हँसी दूब 

बादल जो छलके 

बहुत खूब 

*

नेह की बूँद 

मन पांखुरी पर 

गिरी अब,लो 

*

मन विभोर 

कर गए बदरा 

जी सराबोर 

*

मुंह चिढाया …

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Added by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on June 16, 2013 at 11:04pm — 9 Comments

बैठे-ठाले ~~

देखकर लोग बहुत दंग,पूत ,

ढोल बजते औ मृदंग,पूत !



तुमसे अब कौन मुक़ाबिल है 

जीत लेते हो खूब जंग ,पूत !



एक बिल्ली थी वो भाग गई,

तुम तो निकले दबंग,पूत !

कौन तुमसे हिसाब मांगेगा ?

डाल दी है कुएं में भंग,पूत !…

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Added by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on June 15, 2013 at 11:37pm — 4 Comments

गीतिका : हम झुनझुना हो गए !

वो दिखे ही नहीं इन दिनों 

दूज का चन्द्रमा हो गए 

इतने बीमार हम भी नहीं 

अपनी खुद ही दवा हो गए 

हैं सु-फल आपकी दृष्टि के 

क्या थे हम और क्या हो…

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Added by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on June 14, 2013 at 11:51pm — 13 Comments

सोने का लोटा ,नंगे बदन पर लंगोटा !

 सुना भगवानों के पास धन बहुत,

और अपने देश में निर्धन-बहुत !



मंदिरों में जमा है अकूत सोना ,

वहीँ द्वार पर भूखी भीड़,दो,ना !

 …

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Added by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on June 12, 2013 at 9:30pm — 8 Comments

गिरा दे बूँदें : हाइकू ~

गिरा दे बूँदें 

प्रतीक्षारत हम 

नयन मूंदे 

*

और न कस 

हर कोई बेबस 

अब बरस 

*

चली जो हवा 

उड़ गए बादल 

हम नि:शब्द 

*

मन बहका 

आवारा बादल सा 

उड़ गया लो 

*

बरसे धार 

बढे -उमड़े प्यार 

हर्ष अपार 

*

सब है वृथा 

काश, घन सुनते 

हमारी व्यथा 

*

सलोने घन 

या तो डुबो देते हैं 

या जाते डूब

*

आये बौछार 

बजें मन के…

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Added by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on June 11, 2013 at 2:27pm — 7 Comments

एक गीतिका ज़िदगी की

ज़िंदगी इतने दिन तूफ़ान रही,

कभी बारिश,कभी मुस्कान रही 



मिर्च थी खूब,मसाले भी बहुत

सौदा-सुलुफ की ये दुकान रही 

लोग चेहरे लगाये ,आये ,गए 

कौन रिश्ते थे बस पहचान रही 



आसमां पर निरी सलाखें थीं 

अपनी आँगन में ही उड़ान रही 

खूब ढोया है उम्र को हमने 

इसलिए दोस्त,कुछ थकान…

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Added by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on June 10, 2013 at 10:55pm — 12 Comments

कुछ मुक्तक

गाँव बदले हुए हैं ,शहर हो गए ,

स्वार्थ की आत्म-केंद्रित नहर हो गए,

सूर्य में थीं यहीं नेह की रश्मियाँ

रिश्ते सब गर्म अब दोपहर हो गए !

*

आओ मिलकर मोड दें पन्ने किताब के ,

और ढूँढें फूल कुछ सूखे गुलाब के ,

सकपकाई उम्र ,वो बारिश सवालों की

खूबसूरत झूठ ,वो किस्से जवाब के !

*

दर्द को खूब लिखा ,

गहरे जा डूब लिखा ,

पाँव जब जलने लगे

पथ को हरी दूब लिखा !

*

रूप की एक नदी बहती है,,

खूबसूरत ए हंसी लगती है,

फूल,घाटी…

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Added by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on June 9, 2013 at 10:00pm — 8 Comments

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