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मन सिहरा ,ठहरा तनिक ,देखा अप्रतिम रूप ,

भोर सुहानी ,सहचरी ,पसर गई लो, धूप !

रश्मि-रश्मि मे ऊर्जा और सुनहरा घाम,

बिखर गया है स्वर्ण-सुख लो समेट बिन दाम !

सुन किलकारी भोर की विहंसी निशि की कोख ,

तिमिर गया ,मुखरित हुआ जीवन में आलोक !

उगा भाल पर बिंदु सा लो सूरज अरुणाभ ,

अब निंदिया की गोद में रहा कौन सा लाभ !

_______________प्रो.विश्वम्भर शुक्ल ,लखनऊ 

(मौलिक और अप्रकाशित )

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Comment by Dr Ashutosh Mishra on August 15, 2013 at 10:51am

जीवन से अँधेरा चला जाए और आलोक फ़ैल जाए इससे सुखद क्या हो सकता है  बेहतरीन 

Comment by annapurna bajpai on July 23, 2013 at 10:21pm

आदरणीय शुक्ल जी बहुत ही बढ़िया दोहे , सोना बिखेरते हुए , बहुत बधाई आपको ।

Comment by Ketan Parmar on July 19, 2013 at 11:58am

वाह !! सुन्दर दोहे...

हार्दिक बधाई !!!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 18, 2013 at 1:46pm

आदरणीय विश्वम्भरजी,  आपके छंद प्रयास पर आपको सादर धन्यवाद.

आपकी प्रस्तुति के आलोक में बहुत कुछ स्पष्ट हुआ है. 

डॉ. प्राची के सुझाव पर ध्यान देना उचित होगा. 

छंद प्रयास की हो श्रद्धा और धैर्य की अपेक्षा करता है. 

सादर

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on July 16, 2013 at 1:22pm

bahut hi sundar dohe rache hain aadarneey sir ji .............bahut bahut badhaai ho

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on July 15, 2013 at 7:09pm

वाह !! सुन्दर दोहे...

हार्दिक बधाई !!!

Comment by राजेश 'मृदु' on July 15, 2013 at 5:03pm

बहुत ही मनोहारी दोहे हैं, सादर

Comment by विजय मिश्र on July 15, 2013 at 4:42pm
सुंदर मित्रवर

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 15, 2013 at 9:56am

भोर की सुन्दरता का मनोहारी चित्रण..हार्दिक बधाई आदरणीय विशम्भर शुक्ल जी 

इस दोहे पर आपका ध्यानाकर्षण चाहूंगी :

रश्मि-रश्मि मे ऊर्जा और सुनहरा घाम,................विषम चरण की मात्रा १२ हो रही है और अंत भी २२ से है, यद्यपि विशाम्चरण की मात्रा १३ होनी चाहिये व चरणान्त १२, या १११ से होना चाहिये 

बिखर गया है स्वर्ण-सुख लो समेट बिन दाम !

सादर.

Comment by shashi purwar on July 14, 2013 at 10:50pm

वाह शुक्ल जी सुन्दर दोहे ....हार्दिक बधाई आपको 

कृपया ध्यान दे...

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