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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s Blog – June 2020 Archive (5)

लोटा है साँप फिर से जो उसके कलेजे पर - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)

२२१/२१२१/१२२१/२१२



पाँवों में  छाले  देख  के  राहें नहीं खिली

दिनभर थकन से चूर को रातें नहीं खिली।१।

**

सुनते हैं  खूब  रख  रहे  पहलू में अजनबी

यार ए सुखन से आपकी आँखें नहीं खिली।२।

**

थकते  न  थे  जो  दूरी  का  देते  उलाहना

उनकी ही मुझको देख के बाँछें नहीं खिली।३।

**

लोटा है साँप फिर से जो उसके कलेजे पर

कहता  है  कौन  घर  मेरे  रातें  नहीं खिली।४।

**

लाया करोना  दर्द  तो राहत भी साथ में

ताजी हवा में कौन सी साँसें नहीं…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 29, 2020 at 9:20am — 4 Comments

गेहूँ रहा अलीक न यूँ ही गुलाब से

२२१/२१२१/१२२१/२१२



मारा करे हैं  लोग  जो गम को शराब से

लाते खुशी को देखिए कितने हिसाब से।१।

**

खुशबू है भारी भूख पे सुनते जहान में

गेहूँ रहा  अलीक  न  यूँ  ही  गुलाब से।२।

**

लाता नहीं है होश भी अपने ही साथ क्यों

शिकवा है हमको एक ही यारो शबाब से।३।

**

साधी है हमने यूँ नहीं हर एक तिश्नगी

गुजरा है अपना दौर भी यारो सराब से।४।

**

उनको तो कुर्सी चाहिए पापों की नींव पर

मतलब न रखते आज भी सेवक सवाब…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 8, 2020 at 11:11am — 2 Comments

राजन तुम्हें पता - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२



छलकी बहुत शराब क्यों राजन तुम्हें पता

उसका नहीं हिसाब क्यों राजन तुम्हें पता।१।

**

हालत वतन के पेट की कब से खराब है

देते नहीं जुलाब क्यों राजन तुम्हें पता।२।

**

हम ही हुए हैं गलमोहर इस गम की आँच से

बाँकी हुए गुलाब क्यों राजन तुम्हें पता।३।

**

हर झूठ सागरों सा है इस काल में मगर

सच ही हुआ हुबाब क्यों राजन तुम्हें पता।४।

**

सुनते थे इन का ठौर तो बस रेगज़ार में

सहरा में भी सराब क्यों राजन तुम्हें…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 5, 2020 at 10:30am — 13 Comments

गंगादशहरा पर कुछ दोहे

...............

गंगा जी ने जिस दिवस, धरे धरा पर पाँव

माने गंगा दशहरा, मिलकर पूरा गाँव।१।

**

विष्णुपाद से जो निकल, बैठी शंकर भाल

प्रकट रूप में फिर चली, गोमुख से बंगाल।२।

**

करती मोक्ष प्रदान है, भवसागर से तार

भागीरथ तप से हुआ, हम सबका उद्धार।३।

**

गोमुख गंगा धाम है, चार धाम में एक

जिसके दर्शन से मिटें, मन के पाप अनेक।४।

**

अमृत जिसका नीर है, जीवन का आधार

अंत समय जो ये मिले, खुले स्वर्ग का द्वार।५।

**

अद्भुत गंगाजल कभी, पड़ें…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 1, 2020 at 1:39pm — 4 Comments

उम्मीद क्या करना -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'( गजल)

१२२२/१२२२/१२२२/१२२२



रहेगा साथ सूरज यूँ  सदा  उम्मीद क्या करना

जलेगा साँझ होते ही दिया उम्मीद क्या करना।१।

**

जो बरसाता रहा कोड़े सदा निर्धन की किस्मत पर

करेगा आज  थोड़ी  सी  दया  उम्मीद  क्या करना।२।

**

बनाये  दूरियाँ  ही  था सभी  से  गाँव  में  भी  जो 

नगर में उससे मिलने की भला उम्मीद क्या करना।३।

**

चला करती है उसकी जब इसी से खूब रोटी सच

वो देगा छोड़ छलने की…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 1, 2020 at 5:00am — 4 Comments

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