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बसंत कुमार शर्मा's Blog – April 2020 Archive (3)

हक़बयानी लिख रहे हैं  - ग़ज़ल - बसंत

 

मापनी २१२२ २१२२ २१२२ २१२२ 

दूध को जो दूध और पानी को पानी लिख रहे हैं 

लोग वो कम ही बचे जो हक़बयानी लिख रहे हैं 

 

खेत में ओले पड़े हैं नष्ट सब कुछ हो चुका है 

कूल है मौसम बहुत वे ऋतु सुहानी लिख रहे हैं 

 …

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Added by बसंत कुमार शर्मा on April 27, 2020 at 6:59pm — 10 Comments

मैं तुम्हारे दिल में आकर बैठ जाऊँगा - ग़ज़ल सादर समीक्षा

2122 2122 2122 2 

एक ग़ज़ल  मीठी सुनाकर बैठ जाऊँगा 

मैं तुम्हारे दिल में आकर बैठ जाऊँगा 

 

वक्त मुझको अपने आने का बताओ तो 

राह में पलकें बिछाकर बैठ जाऊँगा 

 

सामने सबके कहूँगा प्यार है तुझसे 

ये न सोचो मैं…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on April 21, 2020 at 5:30pm — 4 Comments

उनके लाल कपोल नहीं होते- ग़ज़ल

जीवन के रिश्तों में इतने झोल नहीं होते 

अपने मुँह में जो ये कड़वे बोल नहीं होते 

 

रस्ता एक पकड़ कर यदि चलते ही जाते हम

मंजिल तक अपने पग डाँवाडोल नहीं होते 

 

कृष्ण भक्ति में अगर नहीं डूबी होती मीरा  

उसके प्याले में भी…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on April 18, 2020 at 9:10am — 6 Comments

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