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Manan Kumar singh's Blog – April 2015 Archive (3)

गजल

गजल/गीतिका (12/04/2015)
अश्क इधर अपने रुख़्सार आया है,
तब उधर प्यार पर एतबार आया है।
तू सिसकता रहा,लमहे गये कितने,
एक कहाँ,दफा हजार बार आया है।
आह भरती चुप उसने मिलायी नजर
ऐसी ही उसकी अदा प्यार आया है।
तू दफा कई था आशियाँ उसके गया,
उसे लगा कोई कसूरवार आया है।
भूल सब रंजोगम,बस जगायेआरजू,
उसके दर आज गुनहगार आया है।
'मौलिक व अप्रकाशित'@मनन

Added by Manan Kumar singh on April 12, 2015 at 10:46am — 6 Comments

नवगीत

नवगीत
मन थोड़ा भटका हुआ है!
सपने टूटे,दिल भी टूटा,
रातें रूठीं,दिन भी रूठा,
उम्मीदों का चाँद झाड़ पर
देखो ना अटका हुआ है!
मन थोड़ा भटका हुआ है!
नयन-गगन में नजर गड़ी,
कैसी फिजा पल्ले पड़ी,
सूख चले अब जलद-नयन,
मानस में खटका हुआ है!
मन थोड़ा भटका हुआ है!!
उठती-सी लहरें उमंगित,
उर-अर्णव कितना तरंगित,
पूरी पूनम थी कल की रात,
प्रात हुआ, झटका हुआ है!
मन थोड़ा भटका हुआ है!!!
@मनन

Added by Manan Kumar singh on April 11, 2015 at 10:30pm — 4 Comments

गीतिका

आते-आते मैंने भी ललना से लगन लगाई है

थोड़ी कह लो देर भले,मैंने भी बीबी पायी है

आयी,मन की कोई भी कली नहीं मुरझाई है

लगता सब हरा-हरा,ख़ुशी चतुर्दिक छाई है।

हूरों की मशहूर कथाएँ होंगी,मुझे भला क्या,

मुझको तो अपनीवाली सबसे आगे भायी है

खाते ठोकर रह गये, कुछ भी तो मिला नहीं,

मुझको तो अपनीवाली मीठी-सी खटाई है।

बूँद-बूँद पानी को तरसा,चलती रहीं हवाएँ,

बेमौसम बरसात हुई,रूप की बदली छाई है।

फूल-फूल भटका हूँ ,काँटों की ताकीद रही,

मधु का अक्षय कोष ले…

Continue

Added by Manan Kumar singh on April 5, 2015 at 12:00pm — 5 Comments

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