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Shree suneel's Blog – April 2015 Archive (5)

कुछ चाँद मेरे

उसकी सासें गातीं हैं सरगम

अौर रात रक़्स करती है/

मैं चाँद की डफली बजाता हूँ,

मगर ये गीत जाने कौन गाता है!



हमने चाँद को चिकुटी काटी /

शरारत सूझी/

उसे प्यार आया, फिर सहलाया /

और,

दे गया चाँदनी रात भर के लिये.



उसे चाँद दे दिया

और ख़ुद चाँदनी ले ली.

ठग लिया यूँ आसमाँ को आज हमने.

सुना है,

आसमां सितारों से शिकायत करता है.



रात की मिट्टी में,

तेरी यादों की एक डाली रोपी

जज्बात से सींचा उसे,

फिर,…

Continue

Added by shree suneel on April 29, 2015 at 4:00pm — 16 Comments

ग़ज़ल ;आसान राहों पे...

2212 2212 2212

आसान राहों पे ले आती है मुझे
उसकी दुआ है, लग हीं जाती है मुझे.

ये शोर दिन का चैन लूटे है मेरा
औ' रात की चुप्पी जगाती है मुझे.

किस किस को रोकूं कौन सुनता है मेरी
ये भीङ पागल जो बताती है मुझे.

कूचे में जो मज्कूर है उस्से अलग
दहलीज़ तो कुछ औ' सुनाती है मुझे.

पहलू में मेरे बैठी है मुँह मोङ कर
ये ज़िन्दगी यूँ आजमाती है मुझे.

मौलिक व अप्रकाशित

Added by shree suneel on April 28, 2015 at 3:36pm — 24 Comments

बात उतनी कहां पुरानी थी

2122 1212 22

बात उतनी कहां पुरानी थी
मिलते हीं याद तब की आनी थी.

फ़र्क़ इतना दिखा मुझे यारों
अाज पीरी है तब जवानी थी.

वो दिखा हीं न ज़िन्दगी जीते
ज़िन्दगी उसकी बस ज़ुबानी थी.

बेवफ़ा हो के रात भर रोया
बेबसी उसकी क्या कहानी थी.

आज दरिया-ए-चश्म में उसके
थोङे पानी में क्या रवानी थी.

मौलिक व अप्रकाशित

Added by shree suneel on April 12, 2015 at 11:27am — 18 Comments

शिलाचित्र

मिट्टी के तत्वों से

गल चुके सैंकङों शब्द

कि शिलालेख की अर्थवत्ता खो चुकी.

जब कि,

अक्षम शिलालेख के नीचे

हस्ताक्षर सा शिलाचित्र

वयक्त कर रहा था सबकुछ.



कई-कई पुरूषों के बीच

अपह्रीत नारी, उसकी अस्मिता,

संकुचित देह से जैसे फटकर

निकलते आत्मरक्षार्थ हाथ.



पुरुषत्व के आगे याचनावत् थी नारी.



मिट्टी के तत्वों ने

शब्दों की तरह गलाया नहीं उसे,



इसलिए कि वह शिलाचित्र था

सर्वत्र के धरातल पर

सर्वदा की विषैली… Continue

Added by shree suneel on April 9, 2015 at 2:46pm — No Comments

रात पूछती नहीं

रात के कुएं में

क्या मैं हूँ कूपमंडूक की भांति

और मुझे भान नहीं

उजालों के अस्तित्व का.



या कि हूँ एक भागा हुआ आदमी -

उजालों के भय से.



कुछ भी सोचो, तय यही है,

मुझसे गप्पें मारतीं रातें

पूछतीं नहीं- 'तुम क्यों हो नंगे' .



दिखातीं नहीं मेरी दुरवस्था औरों को,

घर की बात समझतीं हैं.



कह रही थी वह-

एक भाई है मेरा,

मेरी प्रकृति के विपरीत,

सवाल करता है बहुत,

पटरी बैठती नहीं मेरी-उसकी.



मौलिक व…

Continue

Added by shree suneel on April 5, 2015 at 1:30am — 6 Comments

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