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Dr.Prachi Singh's Blog – March 2016 Archive (9)

हार कर भी जीत जाने का भला क्या अर्थ है? ....ग़ज़ल// डॉ. प्राची

राज़ हर दिल में छुपाने का भला क्या अर्थ है ?

गैर पर हासिल लुटाने का भला क्या अर्थ है ?



हो बहुत विद्वान तुम, पर ये न समझोगे कभी

हार कर भी जीत जाने का भला क्या अर्थ है ?



प्यार में तकरार होना कर लिया मंज़ूर, पर

अजनबी सा पेश आने का भला क्या अर्थ है ?



देह मन का साथ छोड़े, स्वर जुदा हों सत्य से,

इस तरह रिश्ते निभाने का भला क्या अर्थ है ?



सच कहो जब खिलखिलाए एक अरसा हो गया,

जश्न खुशियों का मनाने का भला क्या अर्थ है ?



जम चुके… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on March 30, 2016 at 11:32am — 6 Comments

भ्रम भुला दो तुम ज़रा...ग़ज़ल// डॉ. प्राची

2122,2122,2122,212



ताज है या एक सूली ये बता दो तुम ज़रा।

इश्क के हर राज़ से पर्दा उठा दो तुम ज़रा।



होश में हूँ अब तलक इस बात पर हैराँ हो क्यों?

इश्क है गर नीँद तो मुझको सुला दो तुम ज़रा।



फूल की हर सेज पर तो चल चुके अब तक बहुत,

है चुभन गर इश्क तो, काँटे बिछा दो तुम ज़रा।



मेरी हस्ती आज भी मुझमें बची ज़िंदा कहीं,

इश्क है मिटना अगर, मुझको मिटा दो तुम ज़रा।



मेरी इन वीरानियों में चित्र कोई बन सके,

ख्वाब कुछ रंगीन पलकों पर सजा दो… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on March 28, 2016 at 1:26pm — 6 Comments

होली मनाना आपका.....ग़ज़ल // डॉ. प्राची

है अदा या फिर सितम होली मनाना आपका।

रात के बारह बजे जी भर सताना आपका।



रंग ले आना छिपाकर नित नई तरकीब से

हाय! चालों में उलझ हल्ला मचाना आपका।



टैग तय कर टोलियों में, बालटी के ड्रम लिए

क्या गज़ब अंदाज़ है, टोली में जाना आपका।



जीन्स टी-शर्टों की कतरन काट करना चीथड़े

बन लफंडर साथ फिर ऊधम मचाना आपका।



हम भला कोरे रहें ये आपको मंज़ूर कब

पर कहो अच्छा है क्या हमको भिगाना आपका?



बन के बन्दर लौटकर दर्पण में खुद को देखकर

साल के… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on March 23, 2016 at 3:00pm — 8 Comments

होली पर एक प्रेम गीत....//डॉ. प्राची

माही तेरा रंग गुलाबी, सब रंगो में सबसे से गहरा



रंग भरी ले कर पिचकारी

क्यों करता नटखट अठखेली,

हाय! मेरी चूनर रंग डाली

चुहल करे हर एक सहेली,

पायल की रुनझुन में गुपचुप, मगर लाज का गूँजा पहरा।



इस अबीर का रंग है पक्का

लग जाए फिर ये ना छूटे,

बंधन ऐसा प्रेमपाश का

जुड़ जाए फिर ये ना टूटे,

शब्द-शब्द अंतर से उतरा, पर आँखों में आ कर ठहरा।



माही के रंगो में सोनी

सोनी के रंग रंगा माही,

ढले एक दूजे के ढंग में

जन्मों के जैसे… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on March 21, 2016 at 8:27pm — 2 Comments

हँसी दो चार दिन की है...(ग़ज़ल) //डॉ. प्राची

1222.1222.1222.1222



हैं बस दो-चार दिन आँसू, हँसी दो-चार दिन की है।

सँजोयें क्या भला, जब ज़िन्दगी दो-चार दिन की है?



भले हो काँस्य या कञ्चन ये कारागार टूटेगा

यहाँ पर श्वास केवल बंदिनी दो-चार दिन की है।



अँधेरी रात से लड़ने को इक दीपक सहेजें खुद

मिली जो रहमतों की रौशनी, दो-चार दिन की है।



पिये हर घूँट में नदिया, वही लहरों में इतराए

समंदर की भला कब तिश्नगी दो-चार दिन की है?



मेरी आँखों में गर देखो, तो पत्थर दिल पिघल जाए

मुझे… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on March 15, 2016 at 12:41pm — 8 Comments

उसे ज़िन्दगी की वो ताल दे (ग़ज़ल)...//डॉ.प्राची

11212 ,11212 ,11212 ,11212



हो भले कठिन मेरी हर डगर, मुझे चाहे कोई भी हाल दे।

मेरा हर कदम यूँ सधा पड़े, कि जहान जिसकी मिसाल दे।



न किसी किताब के प्रश्न हों, न जवाब उनकेे कहीं मिलें

मेरी नज़्र ही हो जवाब हर, तू उसे ज़रा वो सवाल दे।



वो घुला है मुझमे कुछ इस कदर, कि न हो सके कोई वापसी

मेरा चीर दिल, मेरे होश ले, मेरी जान चाहे निकाल दे।



मैं चलूँ चले, मैं थमूँ थमे, जो हँसू हँसे, मेरे साथ ही

मेरा प्यार छू ले हर इक ज़हन, मेरी शख्सियत में कमाल… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on March 10, 2016 at 7:46am — 6 Comments

खुला आकाश तेरा है ..... (विश्व महिला दिवस पर) //डॉ. प्राची

ये माना रात गहरी है, सुनहरा पर सवेरा है।

सलाखें तोड़ दे बुलबुल, खुला आकाश तेरा है।



तुझे जो रोकती है वो

हर इक ज़ंज़ीर झूठी है,

ज़रा झंझोड़ हर बंधन,

कहाँ तकदीर रूठी है ?

उड़ानों पर तेरा हक़ है, ये पिंजर कब बसेरा है?

सलाखें तोड़.....



ज़माने के तराजू पर

न अपने पंख अब तू तोल,

'खुले अम्बर' की परिभाषा

जो सच समझे, वही तू बोल।

ये तेरा चित्र है जिसका, तेरा दिल ही चितेरा है।

सलाखें तोड़.....



तुझे छूना है चन्दा को

तुझे… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on March 7, 2016 at 9:53pm — 11 Comments

इतनी बड़ी भी ख्वाहिशें अच्छी नहीं होतीं (ग़ज़ल)......डॉ. प्राची

2212,2212,2212,22



अपनों के गम पर आतिशें अच्छी नहीं होतीं।

यूँ पीठ पीछे साजिशें अच्छी नहीं होतीं।



घर-बार रिश्तेदार सब हों दाँव पर, जिसमे

इतनी बड़ी भी ख्वाहिशें अच्छी नहीं होतीं।



कुछ बाँट पाओ बोझ तो साथी को आए चैन

दिन रात बस फरमाइशें अच्छी नहीं होतीं।



गर नीँव ही हो खोखली रिश्ते बचें क्या ख़ाक

मन में सुलगती रंज़िशें अच्छी नहीं होतीं।



सागर पुकारे प्यास रख, तो दौड़ती है वो

बहती नदी पर बंदिशें अच्छी नहीं… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on March 3, 2016 at 12:36pm — 9 Comments

ऐसे हालात का इल्ज़ाम मुझे मत देना। (ग़ज़ल)....डॉ. प्राची

2122.1122.1122.22



तुम सजा सा कोई ईनाम मुझे मत देना।

प्यार का रुसवा सा अंजाम मुझे मत देना।



तुम पुकारो भी नहीं, और न कभी मैं आऊँ

ऐसे हालात का इल्ज़ाम मुझे मत देना।



अपना साया ही डराए मुझे तन्हाई में

इतनी सूनी भी कोई शाम मुझे मत देना।



तुम अगर ज़ह्र भी दो, हँस के उसे पी लूँ, पर

बेवफाई का गम-ए-जाम मुझे मत देना।



तेरी साँसों से जुड़ी हैं मेरी साँसे हमदम

रुखसती का कभी पैगाम मुझे मत देना।



मेरी पहचान बना दी है तमाशा… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on March 1, 2016 at 6:02pm — 7 Comments

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