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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s Blog – February 2026 Archive (3)

हरकत हमें तो वैद की रखती तनाव में -लक्ष्मण धामी 'मुसफिर'

बदला ही राजनीति के अब है स्वभाव में

आये कमी कहाँ  से  कहो  फिर दुराव में।१।

*

अवसर समानता का कहे सम्विधान तो

पर  लोकतंत्र  व्यस्त  हुआ  भेदभाव में।२।

*

करना था दफ़्न देश ने जिस जातिवाद को

फिर से जिला  दिया  है  उसे  ताव-ताव में।३।

*

खतरा नहीं है घाव से मरहम से है मगर

हरकत हमें तो वैद की रखती तनाव में।४।

*

सम्पन्न देश हो न हो इतना तो हो मगर

जीवन…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 14, 2026 at 5:09pm — 2 Comments

घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२

******

घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये

उघड़े  शरीर  आप  ही  सम्मान  हो गये।१।

*

गुर्बत हटेगी बोल के कुर्सी जिन्हें मिली

उनको गरीब लोग ही जल-पान हो गये।२।

*

घर में बहार नल से जो आयी गरीब के

पनघट हर एक गाँव  के वीरान हो गये।३।

*

भारी हुए जो उनके ये व्यवहार कर्म पर

सारे ही फर्ज, कौम को अहसान हो गये।४।

*

हाथों अपढ़ के देखते शासन की डोर है

पढ़ लिख गये जो देश में दरवान हो…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 7, 2026 at 6:23am — 1 Comment

तब मनुज देवता हो गया जान लो,- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२/२१२/२१२/२१२
**
अर्थ जो प्रेम का पढ़ सके आदमी
एक उन्नत समय गढ़ सके आदमी।१।
*
आदमीयत जहाँ खूब महफूज हो
एक ऐसा कवच मढ़ सके आदमी।२।
*
दूर नफ़रत का जंजाल करले अगर
दो कदम तब कहीं बढ़ सके आदमी।३।
*
खींचने में लगे  पाँव अपने ही अब
व्योम कैसे सहज चढ़ सके आदमी।४।
*
तब मनुज देवता हो गया जान लो
लोक मन में अगर कढ़ सके आदमी।५।
**
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 1, 2026 at 11:24pm — No Comments

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