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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s Blog – January 2015 Archive (6)

घाव की मौजूदगी में - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

2122   2122    2122   2122

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मन  किसी  अंधे  कुए  में  नित  वफ़ा  को  ढूँढता है

जबकि तन  लेकर हवस को रात दिन बस भागता है

*****

तार  कर  इज्जत   सितारे   घूमते  बेखौफ  होकर

कह रहे सब खुल के वचलना चाँद की भोली खता है

*****

जिंदगी  भर  यूँ  अदावत  खूब  की   तूने  सभी  से

मौत  के  पल  मिन्नतें  कर  राह  में क्यों रोकता है

****

जाँच  को  फिर  से  बिठाओ आँसुओं कोई कमीशन

घाव   की   मौजूदगी    में    दर्द  …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 29, 2015 at 11:14am — 28 Comments

सात फेरों की रस्में निभाओ मगर - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

2122    1221    2212

**********************

रूह  प्यासी  बहुत  घट ये  आधा न दो

आज ला के निकट कल का वादा न दो



रूख  से  जुल्फें  हटा  चाँदनी  रात में

चाँद को  आह  भरने  का मौका न दो



फिर  दिखा  टूटता नभ  में तारा कोई

भोर  तक  ही  चले  ऐसी आशा न दो



प्यार  के  नाम  पर  खेल कर देह से

रोज  मासूम  सपनों  को धोखा न दो



सात फेरों  की  रस्में  निभाओ  मगर

देह  तक ही  टिके  ऐसा  रिश्ता न दो



चाहिए  अब …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 23, 2015 at 11:00am — 10 Comments

प्यार माथे का पसीना पोछ दे - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२२   २१२२२ २१२

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हो गया  है  सत्य  भी मुँहचौर  क्या

या  दिया हमने ही उसको कौर क्या

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कालिखें  पगपग  बिछी  हैं निर्धनी

तब  बताओ  भाग्य होगा गौर क्या

****

मार  डालेगा  मनुजता  को  अभी

जाति धर्मो का उठा यह झौर क्या

****

हैं  परेशाँ   आप   भी   मेरी   तरह

धूल पग की हो गयी सिरमौर क्या

****

फूँक  दे  यूँ  शूल  जिनके घाव को

मायने  रखता है  उनको धौर क्या

****

प्यार  माथे  का …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 19, 2015 at 11:46am — 20 Comments

एक बूढ़ी माँ अकेली रह गई - लक्ष्मण धामी ' मुसाफिर '

2122    2122    212

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बस गया है लाल बाहर क्या करे

हो  गया है  खेत  बंजर क्या करे

***

एक बूढ़ी माँ  अकेली  रह  गई

काटने को  दौड़ता घर क्या करे

***

चाँद  लौटेगा  नहीं   अब,  है  पता

रात भर रोकर भी अम्बर क्या करे

***

ठोकरें  खाना  खिलाना भाग्य में

राह  का  टूटा वो पत्थर क्या करे

***

रीत  तो थी, जिंदगी भर साथ की

दे गया धोखा जो सहचर क्या करे

***

हाथ   आयी   करवटों  की  बेबसी

मखमली…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 14, 2015 at 11:26am — 14 Comments

इस नगर में तो मुश्किल हैं तनहाइयाँ - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

2122    1221     2212

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चाँद  आशिक  तो  सूरज दीवाना हुआ

कम मगर क्यों खुशी का खजाना हुआ

****

बोलने   जब   लगी   रात  खामोशियाँ

अश्क अम्बर को मुश्किल बहाना हुआ

****

मिल  भॅवर से स्वयं किश्तियाँ तोड़ दी

बीच  मझधार  में   यूँ   नहाना  हुआ

****

जब  पिघलने  लगे  ठूँठ  बरसात में

घाव  अपना  भी  ताजा  पुराना हुआ

****

देख  खुशियाँ  किसी की न आँसू बहे

दर्द  अपना  भी  शायद  सयाना…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 12, 2015 at 12:30pm — 23 Comments

आज नायक भी यहाँ पर - ग़ज़ल ( लक्ष्मण धामी ' मुसाफिर' )

2122 2122 2122 212

************************

अजनवी  सी  सभ्यता के बीज बोकर रह गए

सोचकर अपना, किसी का बोझ ढोकर रह गए

***

वक्त  सोने  के  जगा करते हैं देखो यार हम

जागने  के  वक्त लेकिन रोज सोकर रह गए

***

लोरियाँ माँ की, कहानी  नानियों की, साथ ही

चाँद तारे , फूल, तितली लफ़्ज होकर रह गए

***

कसमसाकर  दिल जो खोले है पुरानी पोटली

याद कर बचपन  को यारो नैन रोकर रह गए

***

मानता हूँ , है  हसोड़ों  की जरूरत, दुख मगर

आज नायक भी…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 8, 2015 at 11:11am — 18 Comments

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