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जयनित कुमार मेहता's Blog – January 2016 Archive (5)

सज़ा इश्क़ की बेवफ़ाई न दे (ग़ज़ल)

122 122 122 12



सज़ा इश्क़ की बेवफाई न दे

भले मौत दे पर जुदाई न दे



है मंज़ूर रहना हमें क़ैद में

वो आँखों से जबतक रिहाई न दे



ये इंसाफ़ कैसा है तेरा ख़ुदा

तू जाड़ा तो दे पर रजाई न दे



कहेगा जो सच तो कटेगी जुबां

छुपा बेगुनाही, सफाई न दे



मचा शोर कैसा शहर में, सदा

किसी को किसी की सुनाई न दे



बहुत दूर है मेरी मंज़िल अभी

सफ़र देख मेरा, बधाई न दे

===================



जयनित कुमार मेहता

(मौलिक व… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on January 28, 2016 at 8:58pm — 15 Comments

दिल जो टूटा तो वहम से निकले (ग़ज़ल)

2122 1122 22


उनकी महफ़िल से शरम से निकले
दिल जो टूटा तो वहम से निकले

आदमी से वो बने फिर शैतान
जैसे ही दैरो-हरम से निकले

मेरे लफ़्ज़ों में कोई बात नहीं?
आप शायर क्या जनम से निकले

आप खरगोश थे,उछले जी भर
हम तो कछुए-से कदम से निकले

आइना सामने जो आया तो
उसमें चेहरे कई हम-से निकले

मौत आए, तो ये ग़म का मारा
ज़ीस्त के ज़ुल्मो-सितम से निकले
======================
(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by जयनित कुमार मेहता on January 17, 2016 at 2:42pm — 7 Comments

रात की सूनी पगडंडी पर (अतुकांत कविता)

रात की सूनी पगडंडी पर

मैं और मेरी तनहाई

निकल पड़ते हैं अक्सर अनंत यात्रा पर

बहुरंगी सपनों के पीछे,नंगे पाँव

चाँद गवाह होता है इस सफ़र का

और हमसफ़र अनगिनत जुगनू

मुसलसल सफ़र के बीच

अचानक!सामने बहने लगती है एक नदी

मैं तैराकी से अनजान

डूबते-उभरते पहुँचता हूँ उस पार

चार कदम आगे बढ़ती है यात्रा

तभी, पगडंडी पर उग आते हैं जहरीले काँटें

लौट जाता हूँ हर बार

अपने प्रारब्ध को कोस कर

कौन बिछाता है जाल काँटों का?

क्या है,इस तिलस्मी नदी का… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on January 13, 2016 at 9:06pm — 4 Comments

तू जीता है,मगर ज़िंदा नहीं है (ग़ज़ल)

1222 1222 122



अगर दिल में तेरे करूणा नहीं है

तू जीता है, मगर ज़िंदा नहीं है



वो क्या समझे किसी की अहमियत को

कि जिसने कुछ,कभी खोया नहीं है



तेरी आँखों के मयखाने में बैठा

कहे ये दिल,कोई तुझ सा नहीं है



उगाते हैं जो दाना,उनके घर में

कभी चावल,कभी आटा नहीं है



मिलेगा फल यहीं कर्मों का तेरे

अलग कोई,कहीं दुनिया नहीं है



मेरी मंज़िल खड़ी है जिस जगह पर

वहां तक रास्ता जाता नहीं… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on January 10, 2016 at 10:14pm — 23 Comments

बीज नए पुष्पों के बोए साल नया (ग़ज़ल)

22 22 22 22 22 2



सबके मन की गांठें खोले साल नया

बिखरे रिश्तों को फिर जोड़े साल नया



भूखे को दे रोटी, निर्धन को धन दे

सबकी खाली झोली भर दे साल नया



ग़म से आहत दिल डूबा है आशा में

शायद थोड़ी खुशियाँ लाए साल नया



नभ में कदम बढ़ाता वो सूरज ही है

निकल पड़ा है या मुस्काए साल नया



मधु-हाला निःशुल्क मिलेगा मालिक से

कहता 'हरिया' जल्दी आए साल नया



जीवन का हर क्षण हो जाए सुरभित "जय"

बीज नए पुष्पों के बोए साल… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on January 1, 2016 at 7:56pm — 5 Comments

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