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Saurabh Pandey's Blog – January 2015 Archive (2)

फिर-फिर पुलकें उम्मीदों में (नवगीत) // --सौरभ

फिर-फिर पुलकें उम्मीदों में

कुम्हलाये-से दिन !



सूरज अनमन अगर पड़ा था..

जानो--

दिन कैसे तारी थे..

फिर से मौसम खुला-खुला है..

चलो, गये जो दिन भारी थे..



सजी…

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Added by Saurabh Pandey on January 8, 2015 at 2:14pm — 13 Comments

कविता मत लिखो (अतुकान्त) // --सौरभ

आप कविता लिखते हैं ? .. कौन बोला लिखने को..?

शब्द पीट-पीट के अलाय-बलाय करने को ?

मारे दिमाग़ खराब किये हैं ?

कुच्छ नहीं बदलता.. कुच्च्छ नहीं. ..

इतिहास पढ़े हैं ?

क्या बदला आजतक ? ...

खलसा कलेवर !…

Continue

Added by Saurabh Pandey on January 8, 2015 at 12:00am — 16 Comments

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