For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

सतविन्द्र कुमार राणा's Blog – January 2018 Archive (5)

कि है जो कर्ज़ माटी का लहू देकर चुकाते हैं-सतविन्द्र कुमार राणा

गजल

1222 1222 1222 1222

बताना है सभी को हम हलाली का ही खाते हैं

कि है जो कर्ज़ माटी का लहू देकर चुकाते हैं



सियासत भी है अच्छी शय जिसे अक्सर बुरा माना

भले कुछ रहनुमा भी हैं जो सबके काम आते हैं



दिशा दक्षिण में सर्दी चल पड़ी मधुमास आते ही

चमन में गुल महक उट्ठे भ्रमर भी गुनगुनाते हैं



समझना है जरा मुश्किल भरोसा किस पे करलें हम

कभी अपने उठाते हैं कभी अपने गिराते हैं



सलामत किस तरह दुनिया रहेगी आज 'राणा' बोल

भुलाकर लोग…

Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on January 30, 2018 at 7:00am — 15 Comments

बढ़े तो दर्द अक्सर टूटता है-ग़ज़ल


1222 1222 122
बढ़े तो दर्द अक्सर टूटता है
अबस आँखों से झर कर टूटता है

गुमाँ ने कस लिया जिस पर शिकंजा
भटकता है वो दर-दर,टूटता है

नहीं गम घर मेरे आता अकेले
कि वो तो कोह बनकर टूटता है

सुने गर चीख बच्चे की तो देखो
रहा जो सख़्त पत्थर टूटता है

बजें बर्तन हमेशा साथ रह कर
भला इनसेे कभी घर टूटता है

मौलिक अप्रकाशित

अबस:बेबस

कोह:पहाड़

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on January 21, 2018 at 9:00pm — 10 Comments

बहाने पर ज़माना चल रहा है-ग़ज़ल

1222 1222 122

बहाना ही बहाना चल रहा है
बहाने पर ज़माना चल रहा है

बदलना रंग है फ़ितरत जहाँ की
अटल सच पर दिवाना चल रहा है

नही गम में हँसा जाता है फिर भी
अबस इक मुस्कुराना चल रहा है

निवाला बन गया अपमान मेरा
ये कैसा आबो दाना चल रहा है

वफा मेरी मुनासिब है तो फिर क्यों
अगन सेआजमाना चल रहा है

नहीं रिश्ता है पहले-सा हमारा
मग़र मिलना-मिलाना चल रहा है

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on January 17, 2018 at 6:16pm — 8 Comments

कुंडलियां

कुण्डलियाँ



१.

मिलना-जुलना जान लो,है रिश्तों को खाद

स्नेह-मिलन होता रहे,चखें नेह का स्वाद

चखें नेह का स्वाद,बात औरों की जानें

करकें बातें चार,स्वयं को अच्छा मानें

'सतविंदर' इस स्नेह,की न हो सकती तुलना

पनपें एक्य विचार,रहे यदि मिलना-जुलना।।



२.

समरथ हैं बस देवता,सच्चे रचनाकार

गीत गजल संगीत के,हैं अच्छे फ़नकार

हैं अच्छे फ़नकार,रचें नित न्यारी माया

इनका हर सद्कर्म, ज़माने को है भाया

'सतविंदर' कविराय,करो न प्रयास… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on January 15, 2018 at 9:31am — 8 Comments

एक जुगनू भी है दीपक तीरगी में- गजल



2122 2122 2122

इश्क में, व्यापार में या दोस्ती में

दिल दिया है हमने अपना पेशगी में

बूँद भर भी आब काफी तिश्नगी में

एक जुगनू भी है दीपक तीरगी में

ठोकरें खाकर नहीं सीखा सँभलना

क्या मज़ा आएगा  ऐसी जिन्दगी में

दर्द,आंसू,बेबसी के बाद भी क्यों

मन रमा रहता हमेशा आशिकी में

किस जमाने…

Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on January 9, 2018 at 8:30pm — 10 Comments

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

धर्मेन्द्र कुमार सिंह posted a blog post

रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)

बह्र: 22 22 22 22 22 2 रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिएजंगल का कानून है पहला, चुप रहिएमँहगाई से…See More
50 minutes ago
रोहित डोबरियाल "मल्हार" posted a blog post

दास्तां

एक हो दास्तां तो सुनाएं,लंबी है कहानी, फिर कभी।मिले थे जिस जगह इक उम्र पहले,वो धुंधली सी निशानी,…See More
51 minutes ago
Awanish Dhar Dvivedi posted a blog post

समय

समय को दोष देना क्यूँ समय जीना सिखाता है समय की गति सुनिश्चित है समय ही तो विधाता है।। समय का खेल…See More
51 minutes ago
धर्मेन्द्र कुमार सिंह commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देश की बदक़िस्मती थी चार व्यापारी मिले (ग़ज़ल)
"बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय सौरभ जी"
1 hour ago
आशीष यादव replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"उम्मीद है कि इस पटल से संबंधित कोई अच्छी खबर आएगी।"
8 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देश की बदक़िस्मती थी चार व्यापारी मिले (ग़ज़ल)
"इस सुंदर बुनावट और कहन पर आज नजर पड़ी, आदरणीय धर्मेन्द्र जी.  हार्दिक बधाई   "
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' shared their blog post on Facebook
Sunday
धर्मेन्द्र कुमार सिंह commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देश की बदक़िस्मती थी चार व्यापारी मिले (ग़ज़ल)
"बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय Ravi Shukla जी"
Sunday
धर्मेन्द्र कुमार सिंह commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देवता चिल्लाने लगे हैं (कविता)
"बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय Ashok Kumar Raktale जी"
Sunday
Awanish Dhar Dvivedi posted a blog post

माँ

माँ यह शब्द नहींं केवलइस जग की माँ से काया है। हम सबकी खातिर अतिपावन माँ के आँचल की छाया है।१।माँ…See More
May 19
Dayaram Methani replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"अगर आप यों घबरा कर मैदान छोड़ देंगे तो जिन्होने एक जुट होकर षड़यन्त्र किया है वे अपनी जीत मानेंगे।…"
May 19
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"अब, जबकि यह लगभग स्पष्ट हो ही चुका है कि OBO की आगे चलने की संभावना नगण्य है और प्रबंधन इसे ऑफलाइन…"
May 18

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service