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neeraj tripathi
  • Male
  • Anand, Gujarat
  • India
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Male
City State
anand, gujarat
Native Place
allahabad
Profession
professional with non profit organisation
About me
looking to rediscover my writing passions

Neeraj tripathi's Blog

हिन्दुस्तान मेरा था

तुम्हारे दर पे वो सारा सामान मेरा था,
गली के दायें से चौथा मकान मेरा था,
और तुम जिसे कहते हो पाक़ मुल्क हुज़ूर,
पुराने वक़्त में हिन्दुस्तान मेरा था;

आज तुम मानवता की सारी मिसाल भूल गए,
पडोसी होकर के अपनी दीवार भूल गए,
हमें देखकर नुक्लिअर होना याद रहा,
हम सब का एक ही 'परवरदिगार' भूल गए;

Posted on July 17, 2011 at 10:25am

बूंदों का बहना स्वीकार करो

फुहारों में रिमझिम बरसती,

या पेड़ों के,

मादक पत्तों से,

रिस रिस कर गिरती,

ये पानी की बूँदें हैं,

इनका मौसम से,

अपना सरोकार होता है,

और ज़रा गौर करेंगे तो,

हर बूँद का,

अपना आकार होता है...



बादलों से निकलती हैं,

तो बारिश बन जाती हैं,

अनुपात में गिरें तो जीवन,

वरना बहुत कहर ढाती हैं,

अधिक होने पर,

सैलाब आता है,

और हम आप कितना भी कर लें,

धरती का दर्द,

इन्हें सोख नहीं पाता है,

और यदि ये न बरसें,…

Continue

Posted on July 17, 2011 at 10:24am

हम भी मुस्कुराएंगे

तुम जो कहते थे दोस्ती है,

हमने सोचा था आजमाएंगे;



तुम हमेशा आसरा दिखाते थे,

सोचा हम भी आशियाँ लुटाएंगे;



तुम किनारे पर मगर कैसे पहुंचे,

हमने सोचा था, दोनों डूब जायेंगे;



तुम जिस गली में रहते हो,

हम वहां अब गश्त न लगायेंगे;



तुम्हारा दामन पाक रहे हरदम,

हम गुनाहों का खाम्याज़ा पायेंगे;



तुमने तोड़े थे जो पेड़ों के पत्ते,

सूख गए हैं, हम उन्हें जलाएंगे;



तुम्हारी जिंदगी, जिंदगी रहे 'नीरज',

अज़ल से पर हम भी न… Continue

Posted on June 18, 2011 at 12:59pm — 2 Comments

आंच में ही फूलता है

आज उमस में शरीर से कुछ यूँ पसीना बहता है,

जैसे तेरी आँखों से ऐतबार बहा करता था;

मुहं से कुछ न बोलते थे लफ़्ज़ों से लेकिन,

प्यार का इक हल्का सा इकरार बहा करता था;



आज बीती बातों की बूढी कहानी हो गयी है,

लफ़्ज़ों की मासूमियत भी लफ़्ज़ों में ही खो गयी है;

ये पसीना बहते बहते आज मुझसे कह रहा है,

तुम जिसे समझे मोहब्बत, मेहरबानी हो गयी है;



हमने कितना कुछ कहा था, तुमने कितना कुछ सुना था,

फिर भी क्यों पिछला दिखाने, तुमने लम्हा वो चुना था;

उँगलियों… Continue

Posted on June 14, 2011 at 11:15am

Comment Wall (5 comments)

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At 11:35am on May 26, 2012,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

आज हमारा मेट्रो में "ओपन बुक्स ऑनलाइन" से कालम अंतर्गत ओ बी ओ सदस्य श्री नीरज त्रिपाठी जी की दो कवितायेँ प्रकाशित हुई है |

http://www.openbooksonline.com/xn/detail/5170231:Comment:229289?xg_source=activity

At 11:18pm on October 28, 2010, Ratnesh Raman Pathak said…

At 10:53pm on October 28, 2010,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…
At 10:46pm on October 28, 2010, Admin said…

At 10:43pm on October 28, 2010, PREETAM TIWARY(PREET) said…

 
 
 

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