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anupama shrivastava[anu shri]
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anupama shrivastava[anu shri]'s Page

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bhopal
Profession
teacher
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writter [poem n prose]

कन्या सिर्फ रत्न नहीं ,सराहे और पूजे जाने के लिए

कन्या सिर्फ रत्न नहीं ,सराहे और पूजे जाने के लिएएक सोच है ,दर्शन हैएक ह्रदय है , समर्पण हैऐसी कोरी किताब नहीं,की गाहे -बगाहे.लिख दे कहानी कोई,एक अंतर्मन है.जिसमे करते स्वयं प्रभु रमण हैंउसके सीने में भी ,दिल है धड़कताउसके जज्बातों में भी है कोई बसता,एक मुकम्मल सा फ़रिश्ता,जुड़ा-जुड़ा सा हो जिससे कोई रिश्ताजिसकी नजदीकी सारे बंधन खोलेजैसे नए पंख उड़ने को पर तौले,कोई कर्णप्रिय बात मद्यम सुर में बोलेमन में छुपे अहसास कोई हौले से छूलेजो न कवि की कल्पना, शायर की गजल हो,स्वयं में खिलता स्वर्णकमल होखुद में व्यक्त-अभिव्यक्त, संपूर्ण सकल हो,धागों, अनुबंधों की सीमाओं से परे,उस निराकार में जिसका विलय होअल्हड उन्मादिता का न हो दमननए सुर, भावों में हो जिसका सृजनसागर की गहरे में मोती सा जिसका मनअपना चेहरा दिखाई दे ,ऐसा है वो दर्पण

Anupama shrivastava[anu shri]'s Blog

हसीन पलों का सफ़र



पीपल के पेड़ के नीचे ,बनाया उसने आशियाँ

सिर्फ उसका , उसका ही  था वो जहाँ

जिंदगी…

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Posted on January 21, 2011 at 2:49pm — 2 Comments

स्वप्निल सुबह

गुनगुनाती मध्यम धूप सुबह की, 

तन -मन मैं बिखेर देती है अनगिनित उजाले'

कहीं खो जाते है इस स्वर्णिम चमक में,

मन में छुपे कुछ बादल काले

 

खिल जाती हैं, नयी उमीदों की नयी कोपलें

नई धुन पर तैयार ,नई गुनगुनाहटे,  

  पहले से जवान, पहले से हसीन, 

  मन के कोने से निकलकर कहीं,                           

कोरे कैनवास…

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Posted on January 14, 2011 at 1:00pm — 6 Comments

केक्टस

एक कविता आज के दौर के नाम....



पैसा है, उसका नशा है, और शोहरत है

अब कहाँ इतनी फुरसत है

लोगों के आसपास होने का अहसास नहीं होता

अपनों के खोने का डर आसपास नहीं होता





हसरतें, इतनी कि ख़त्म ही नहीं होती!

पाना ये , वो भी कि, सबर ही नहीं होती

स्नेह, प्यार, विश्वास शब्दों में अब गुजर नहीं होती





प्रकृति के नज़ारे भी लगते… Continue

Posted on December 26, 2010 at 7:00pm — 7 Comments

कन्या सिर्फ रत्न नहीं

कन्या सिर्फ रत्न नहीं,

सराहे और पूजे जाने के लिए एक सोच है ,

दर्शन है एक ह्रदय है ,

समर्पण है ऐसी कोरी किताब नहीं,

कि गाहे -बगाहे. लिख दे कहानी कोई,

एक अंतर्मन है.जिसमे करते स्वयं प्रभु रमण हैं

उसके सीने में भी ,

दिल है धड़कता उसके जज्बातों में भी है कोई बसता,

एक मुकम्मल सा फ़रिश्ता,

जुड़ा-जुड़ा सा हो जिससे कोई…

Continue

Posted on December 18, 2010 at 2:00pm — 5 Comments

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