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लघु कथा :- जीवित्पुत्रिका का पर्व

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 1, 2012 at 6:32pm

सराहना हेतु आभार आदरणीय सौरभ भाई साहब |


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Tilak Raj Kapoor on May 1, 2012 at 5:02pm

आप सभी के स्‍नेह व सम्‍मान के लिये हृदय से आभारी हूँ। कष्‍टदायक व्‍यस्‍तता के कारण इस बार 'तरही' की टिप्‍पणियों में सक्रिय भाग न ले सका, क्षमा प्रार्थी हूँ। एकजाई 'तरही' में अवश्‍य आपके साथ रहूँगा।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 1, 2012 at 4:01pm

Bhawesh Rajpal jee, I do feel so that Labor Day is not celebrated or even remembered by the labors. Actually, it is altogether a different image-building process what you have mentioned. But here, the poets perform their task of bringing the emotion down towards those belonging to 'have' categories.

Thanks

Comment by Bhawesh Rajpal on May 1, 2012 at 3:55pm


Respected Ganesh Ji "Bagi", It`s a touching creation , It tells the reality of labour  who is working every day to eat everyday." Majdoor Diwas" cann`t be celeberation for him . Rich people celeberate to earn image in society but it`s punishment for labour. Any way  my heartiest Regards.  Keep touching the hearts.

Comment by Abhinav Arun on May 1, 2012 at 3:51pm

आदरणीय श्री बागी जी और श्री धर्मेन्द्र जी को हार्दिक बधाई !!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 1, 2012 at 2:12pm

दोनों रचनाएँ भावप्रवणता की दृष्टि ही नहीं शास्त्रीय लिहाज से भी उच्च कोटि की हैं.

प्रकाशन हेतु बधाई.


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 1, 2012 at 1:52pm

खुबसूरत दो शेरों के साथ सराहना हेतु आभार आदरणीय तिलक राज जी |


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 1, 2012 at 1:52pm

आभार आदरणीया राजेश कुमारी जी,


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on May 1, 2012 at 1:51pm

वाह वाह तिलकराज जी आपकी ये मार्मिक पक्तियां दिल पर आघात कर गई 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Tilak Raj Kapoor on May 1, 2012 at 1:45pm

बहुत खूब।

मज़दूर को दिवस पर रोज़ी न मिल सकी
सम्‍मान में दिवस के उपवास हो गया।

बच्‍चा बहुत था भूखा, लेकिन समझ गया वो
चेहरे को देख मॉं के, चुपचाप सो गया।

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