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22 नवम्बर 2011 की शाम अचानक ही यादगार बन गयी.

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 25, 2011 at 10:14am

जी हाँ, मगर मालूम हुआ, भूला या खोया नहीं "था",  अति व्यस्त, लस्त-पस्त, त्रस्त किन्तु स्वयं में मस्त-मस्त था..!!!!!

योगराजभाईजी, रिपोर्ट को भले निरस्त करा दें किन्तु, वहीं रहने दें.  वो रिपोर्ट हमारे परस्पर स्नेह, भाव, प्यार व दुलार का भौतिक रूप बन कर पड़ा रहेगा.   :-)))))))))

 

 


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on November 24, 2011 at 10:52pm

खो गया "था" ! :)))))))))))))))))))))))))))))


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on November 24, 2011 at 10:39pm

ये रिपोर्ट विपोर्ट की क्या बातें हो रही है? कोई खो गया है क्या?

Comment by वीनस केसरी on November 24, 2011 at 9:44pm

क्या ये व्यथा सुन कर कान्हा पिघले ?

:)))))))))))))))))))))))))))))))))))))))))))))))


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on November 24, 2011 at 3:44pm

सौरभ भाई जी - क्या उद्धव जी ने कान्हा को गोपियों के रुदन के बारे में भी बताया कि नहीं ? क्या ये व्यथा सुन कर कान्हा पिघले ?


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on November 24, 2011 at 3:40pm
सौरभ भाई जी, तो क्या अब राणा जी की गुमशुदगी की रपट वापिस ले ली जाये ?

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 23, 2011 at 5:03pm

भाई अभिनव जी,  राणाभाई  करीब तीन-चार माह बाद  ’उदित उदयगिरि मंच पर, रघुबर बाल पतंग’  की नाईं नमूदार हुए. और भाई वीनस के साथ मेरे निवास पर आये थे.  वीनस के साथ हुई प्रथम सापेक्ष भेंट के वे ’काव्य-सरस’ क्षण सभी के लिये मनोहारी व उत्फुल्लता के क्षण थे.  आगे की कई गतिविधियों पर चर्चा हुई.  देखिये, दो-तीन दिनों में क्या-कुछ उभर-निखर कर आता है...!

 

Comment by Abhinav Arun on November 23, 2011 at 2:10pm

kaipshan men milan sthal ka naam bhi rahe to achchha rahe . maine ghazal "guru " isliye likhe hai kyonki rana ji aur venas je mere " ghazal guru " ban jaayen ye request maine inse kiya varna inki har vidha men utkrishth kshamta se sabhi parichit hai again namaskaar !!

Comment by Abhinav Arun on November 23, 2011 at 2:07pm
ग़ज़ल के " राणा प्रताप " और ग़ज़लों के ही "केसरी " और सौरभ जी के क्या कहने | इस त्रिवेणी का संगम होना ही ऐतिहासिक है | ओ बी ओ  की इस त्रिमूर्ति को प्रणाम है | कुछ तो ख़ास हुआ होगा जब मिल बैठे होंगे आप तीनो | इसकी रपट नुमा प्रस्तुति भी होनी चाहिए | ताकि चर्चा से हम सब लाभान्वित हों |.... भाई इस फोटो में आशीर्वाद नुमा हाथ ...सौरभ जी का मेरी पीठ पर भी होता तो क्या बात होती ...| खैर अगली बार ..
Comment by वीनस केसरी on November 23, 2011 at 1:41pm

और जो अगर मेरा हाँथ है भी तो वो वाला हाँथ मैंने अपने दूसरे हाँथ से दबा रखा है :)))))))

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