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क्या गूगल पर लगाम लगा पाएंगे ट्रम्प?

क्या यह संभव है कि दुनिया की नजर में विश्व का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति भी कभी बेबस और लाचार हो सकता है?
क्या हम कभी अपनी कल्पना में भी ऐसा सोच सकते हैं कि एक व्यक्ति जो विश्व के सबसे शक्तिशाली देश के सर्वोच्च पद पर आसीन है, उसके साथ उस देश का सम्पूर्ण सरकारी तंत्र है और विश्व की आधुनिकतम तकनीक से युक्त फौज है, उस व्यक्ति के खिलाफ भी कभी कुछ गलत प्रचारित किया जा सकता है?
शायद नहीं? या फिर शायद हाँ?
आज जब अमेरिका के राष्ट्रपति गूगल फेसबुक और ट्विटर पर अपने अपने प्लैटफोर्म से जनता के सामने अपने खिलाफ लगातार और बार बार फेक न्यूज़ परोसने का इल्जाम लगाते हैं,
आज जब "डोनाल्ड ट्रंप" जैसी शख़सियत कहती  है कि गूगल पर  "ट्रंप न्यूज़" सर्च करने पर उनके खिलाफ सिर्फ बुरी और नकारात्मक खबरें ही पढ़ने को मिलती हैं,
आज जब इंटरनेट पर  "इडियट"  सर्च करने पर  ट्रँप,चाय वाला,फेंकू, सर्च करने पर नरेन्द्र मोदी और पप्पू सर्च करने पर राहुल गाँधी जैसा चेहरा आता है तो क्या कहेंगे आप?
"फेक न्यूज़", आज से दो साल पहले तक शायद ही किसी ने इस शब्द का प्रयोग किया हो लेकिन आज यह सम्पूर्ण विश्व के समक्ष एक चुनौती बनकर खड़ा है। अगर इसकी शुरुआत की बात करें तो इस शब्द का प्रयोग सबसे पहले हिलेरी क्लिंटन ने 8 दिसंबर 2016 को चुनाव के दौरान अपने एक भाषण में किया था जब उन्होंने सोशल मीडिया में दुर्भावनापूर्ण रूप से झूठी खबरों के प्रचार प्रसार को फेक न्यूज़ और एक महामारी तक कहा था।
इसके बाद जनवरी 2017 में ट्रंप ने सी एन एन की एक पत्रकार को फेक न्यूज़ कहकर संबोधित किया और उसके बाद से यह शब्द दुनिया भर के नेताओं और पत्रकारों से लेकर आम आदमी तक की जुबान पर ही नहीं आया बल्कि उनकी जिंदगी से भी खेलने लगा।खासतौर पर तब, जब इस देश के चालीस बेक़सूर लोग मोब ल्य्न्चिंग के शिकार हो जाते हैं।
कहना गलत नहीं होगा कि वर्तमान समय में सोशल मीडिया रोटी कपड़ा और मकान की तरह हमारी जिंदगी का एक अहम हिस्सा बन चुका है। फेसबुक ट्विटर और व्हाट्स अप जैसे सोशल प्लैटफोर्म्स के बिना आज शायद जीवन की कल्पना करना भी असंभव है। और कम्प्यूटर एव्ं इंटरनेट के जरिए जिस डिजिटल क्रांति का जन्म हुआ है उसने राजनैतिक और अर्थव्यवस्था से लेकर हमारे समाज तक को प्रभावित किया है। क्योंकि इसका सबसे खतरनाक पहलू यह है कि इन सोशल माध्यमों पर अगर एक बार संदेश प्रसारित हो गया तो उसका नियंत्रण हमारे हाथ में नहीं रह जाता।
और इस प्रकार के अनियंत्रण का परिणाम आज विश्व का लगभग हर देश भुगत रहा है। यही वजह है कि सर्वोच्च न्यायालय ने सोशल मीडिया के नियमन के लिए सरकार से कानून बनाने को कहा है। दरअसल निजी टीवी चैनलों पर कंटेंट का नियमन "कार्यक्रम एवं विज्ञापन संहिता" करती है जबकि प्रिंट मीडिया नियमन के लिए पी सी आई के अपने नियम हैं लेकिन सोशल मीडिया के नियमन के लिए कोई दिशा निर्देश नहीं है। और सोशल मीडिया पर काम करने वाली कम्पनियाँ भी यह कहकर बच जाती हैं कि इंटरनेट पर दूसरे लोग क्या पोस्ट करते हैं इसके लिए वे जिम्मेदार नहीं हैं। आज जब हर प्रकार की सही गलत जानकारी नेट पर डालने के लिए हर कोई स्वतंत्र है । और  सबसे बड़ी बात यह है कि अपने द्वारा दी गई गलत जानकारी के लिए माफी भी नहीं मांगी जाती न जवाबदेही समझी जाती है, तो स्थिति पर नियंत्रण रहेगा भी कैसे?
कहा जा सकता है कि यह दौर सिटीजन जर्नलिस्म का है जहाँ हर व्यक्ति यह मानता है कि उसके पास जो सूचना है चाहे गलत हो या सही वह सबसे पहले उनके माध्यम से लोगों तक पहुँचनी चाहिए। लेकिन हर बार इसकी वजह "सबसे पहले" वाली सोच ही हो यह भी आवश्यक नहीं है कई बार जानबूझकर भी ऐसा किया जाता है।
लेकिन अब जब इसके घातक परिणाम देश भुगत रहा हैं तो आवश्यक हो गया है कि सोशल मीडिया और इंटरनेट को नियंत्रित करने एवं इनका दुरुपयोग रोकने के लिए सरकार कुछ नियम कानून बनाए। इसके लिए उन देशों से सीखा जा सकता है जो अपने देश में इस समस्या को कानून के दायरे में ले आए हैं।
फेक न्यूज़ पर लगाम लगाने के उद्देश्य से हाल ही में मलेशिया में एंटी फेक कानून 2018 लागू किया गया है जिसमें फेक न्यूज़ फैलाने का आरोप सिद्ध होने पर दोषी को छ साल तक के कारावास और अधिकतम एक लाख तीस हजार डॉलर तक के जुर्माने का प्रावधान है। इसके अलावा जर्मनी की संसद ने भी इंटरनेट कम्पनियों को उनके सोशल मीडिया प्लैटफार्म पर अवैध,नस्लीय, निंदनीय सामग्री के लिए जिम्मेदार ठहराने वाला कानून पारित किया है। इसके तहत उन्हें एक निश्चित समयावधी में आपत्तिजनक सामग्री को हटाना होगा  अन्यथा उन पर 50 मिलियन यूरो तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।यह कानून लोकतांत्रिक देशों में संभवतः अब तक का सबसे कठोर कानून है। खास बात यह है कि वहाँ जब इंटरनेट कम्पनियों ने इस कानून को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए खतरा बताया तो जर्मनी के न्याय मंत्री ने यह कहा कि "अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता वहाँ समाप्त होती है जहाँ आपराधिक कानून शुरु होता है" ।
तो हमारे देश की  सरकार भी इन देशों से सीख लेकर इंटरनेट कम्पनियों पर लगाम लगाकर फेक न्यूज़ जैसी समस्या से जीत सकती है।
डॉ नीलम महेंद्र

"मौलिक व अप्रकाशित" 

 

 

 

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