Tags: कक्षा, ग़ज़ल, ज्ञान, पाठ
Permalink Reply by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 26, 2011 at 10:04pm
Permalink Reply by Rana Pratap Singh on April 26, 2011 at 10:16pm हर दिल अज़ीज़ एहतराम इस्लाम की यह ग़ज़ल कविता कोष पर भी है।
गुमराही का नर्क न लादो कागज़ पर में तहलीली रदीफ़ का उदाहरण भी है इसमें।
ग़ज़ल पर तो मैं कुछ नहीं कहूँगा लेकिन यह सबके देखने का विषय है कि 'दो कागज़ पर' का रदीफ़ कहन की स्पष्टता में बाधक तो नहीं हो रहा।
Permalink Reply by वीनस केसरी on April 27, 2011 at 2:13am :)
Permalink Reply by Rana Pratap Singh on April 27, 2011 at 6:18am आप सही हैं।
'सभ्य सुशिक्षित को बहका दो कागज़ पर' को लेकर किसी को भ्रम हो तो क्ष की प्रकृति पर ध्यान दें यह वज़्न की दृष्टि से वस्तुत: क्श है इस प्रकार यह पंक्ति भी सही है।
Permalink Reply by वीनस केसरी on April 27, 2011 at 2:22am पोस्ट से पूरी तरह से सहमत हू
परन्तु जब हम किसी शायर का मिसरा 'तरही' मुशायरे के लिए चुनते हैं तो रदीफ़ काफिया और बहर भी वही रखते हैं जो शायर ने अपनी ग़ज़ल में रखी है
यह बात ध्यान देने योग्य है की तरही मिसरा का चुनाव करते समय अतिरिक्त सावधानी बरती जाए
@ राणा भाई - रदीफ़ काफिया भी सरल दिया करिए, हम जैसों का भला होगा
@ O.B.O - पिछले दिनों व्यस्तता के कारण प्रतियोगिता और मुशायरे में हिस्सा न ले सका , क्षमा प्रार्थी हूँ
आदरनीय तिलक जी ग़ज़ल के बारे में महत्वपूरण जानकारी देने के लिए धन्यवाद. मेरी एक समस्या है की मैं रदीफ़ काफिये का ध्यान रख लेता हूँ और मात्राएँ भी हर एक शेर में बराबर रख लेता हूँ , लेकिन बहर कैसे निर्धारित होती यह मेरी समझ से बाहर है, कृपा करके बताएँगे की मेरी इस ग़ज़ल की कौनसी बहर है और क्यों?
उसको भी कुछ शिकवा गिला होगा
मेरे संग कुछ और भी जला होगा
राख उडी तो होगी हवा के साथ
इक ज़र्रा उस दामन पे गिरा होगा
सामान तो सब बचा लिया गया होगा
नहीं वो, जो बदन से सिला होगा
मैनें घर जलाया रोशनी के लिए
कौन मुझ जैसा यहाँ दिलजला होगा
आज भी शाम ढल गयी होगी तन्हां
सूरज भी लाली से सना होगा
रुका होगा कुछ सोचकर मेरा यार
दो क़दम घर से ज़रूर चला होगा
रोजी पे गया सो बेखबर होगा
मस्त है जो मखमल पे पला होगा
बह्र के बारे में पहली बात जो समझना जरूरी है वह यह है कि बह्र में कुल मात्रायें नहीं मात्रिक क्रम का पालन करना होता है। दूसरी बात यह है कि प्रत्यक्ष रूप में कभी कभी मात्रिक असमानता दिख सकती है लेकिन ऐसा तभी होता है जब शायर से बह्र के पालन में चूक हुई हो या बह्र के प्रति सावधान रहते हुए भी उसे मात्रा-संतुलन का ज्ञान हो यानि कहॉं मात्रा गिराकर पढ़ना है और कहॉं उठा कर। ग़ज़ल में यह अंश सबसे बाद में सीखने का होता है। आरंभ में ही इसकी आदत पड़ गयी तो शायर में शेर पर मेहनत की आदत का विकास नहीं हो पाता है।
अब आपकी ग़ज़ल पर लौटें तो स्पष्ट दिख रहा है कि मात्रिक क्रम का इसमें अभाव है। आप अगर नये हैं तो कोशिश करें कि किसी अच्छे शायर की ग़ज़ल को आधार बनाकर ग़ज़ल कहें।
Permalink Reply by वीनस केसरी on April 30, 2011 at 2:40pm तिलक जी,
कल संडे है :)
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