For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

"ईश्वर " ( 1)

क्या निंदा या करे  प्रशंसा

जिसको तू ना जाने

कोटि-कोटि ले जन्म अरे हे !

मानव ! तू ईश्वर पहचाने !

---------------------------------------

एक एक अणु - कण सब उसका

सब हैं उसके अंश

जगत नियंता जगदीश्वर है

वो अमोघ है, अविनाशी है, वो अनंत !

----------------------------------------

ओउम वही है शून्य वही है

प्रकृति चराचर सरल विषम - सब

निर्गुण-सगुण ओज तेज सब

जीवन- जीव -है पवन वही !

---------------------------------------

जल भी वो है अग्नि वही है

जल-थल उर्वर शक्ति आस है

तृष्णा - घृणा निवारक स्वामी  बुद्धि ज्ञान है

ऋषि वही है, सिद्धि वही है अर्थ वही है !

-------------------------------------------------

ज्ञानी ब्रह्म रचयिता सब का विश्व-कर्म है

वो दिनेश है वो महेश है वो सुरेश है

रत्न वही है रत्नाकर है देव वही

कल्प वृक्ष है सागर है वो कामधेनु है !

-----------------------------------------------

वो विराट है विभु है व्यापक वो अक्षय है

सूक्ष्म जगत है दावानल है बड़वानल है

वो ही हिम है वही हिमालय बादल है वो

अमृत गंगा मन तन सब है- जठराग्नि है

----------------------------------------------

लील सके ब्रह्माण्ड को पल में

धूल - धूसरित कर डाले

क्या मूरख  निंदा  तुम करते

जो जीवन दे तुझको पाले !

-------------------------------------------

सत्य वही है झूठ वही है नाना वर्ण रंग भेद है

उषा वही है निशा वही है अद्भुत धांधा  वो अभेद्य है

वेद उपनिषद छंद गीत  गुरु - ग्रन्थ बाइबिल  कुरान है

सुर ताल वही सूत्र वही सब कारक है संहारक है

--------------------------------------------------------

ऋषि वैज्ञानिक देव दनुज साधू - सन्यासी

पाल रहा - नचा रहा - लीलाधर बड़ा प्रचारक है

कृति अपनी के कृत्य देख सब - खुश भी होता

कभी कभी वो अश्रु बहाए हर पहलू का द्योतक होता  !

-----------------------------------------------------------

ईहा – घृणा - मोह - माया संताप - काम का

अद्भुत संगम काल व्याल जंजाल जाल का

प्रेम किये है तुझको पल पल देखो प्यारे

जीवन देता कण कण तेरे सदा समाये !

-----------------------------------------------------

आओ नमन करें ईश्वर का - परमेश्वर का

अहम छोड़कर प्रेम त्याग से शून्य बने हम

जीवन उसके नाम करें हम मुक्त फिरें इक ज्योति बने

हर जनम जन्म में मानव बन आ मानवता को प्रेम करें !

---------------------------------------------------------

अपनी मूढ़ बुद्धि है जितनी -जितनी  दूर चली जाए

सारा जीवन आओ खोजें खोज - खोज जन हित में लायें

निंदा और प्रशंसा छोड़े बिन-फल इच्छा - कर्म करें

पायें या ना पायें कुछ भी उसके प्यारे हो जाएँ  !

---------------------------------------------------------------------------------------------------------

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५

२६.४.१२ ८.३०-९ पूर्वाह्न

कुल्लू यच पी

Views: 1547

Replies to This Discussion

सुरेन्द्र जी ,ईश्वर  के प्रति आपकी भावनाओं को मेरा नमन ,

 

आदरणीया रेखा जी  आप ने उस  परम पिता परमेश्वर की रचना पर हाजिरी लगायी और समर्थन दिया ख़ुशी हुयी ईश्वर एक है हम सब उसमे एक अंश बस  ..जय श्री राधे 

भ्रमर ५ 
आदरणीय सुरेन्द्र कुमार शुक्ल जी
बहुत ही सुन्दर रचना
हर तत्व में ईश्वर को देखना, सब कुछ उसकी ही लीला है,  वो परम शक्तिमान है..
पर वो मुझसे अलग है????????????  (जीवन देता कण कण तेरे सदा समाये !) यानि वो अलग नहीं है...
 
जब सब कुछ वो है तो, मैं भी तो वही ईश्वर हुआ ना
 
यही अहम् ब्रह्मास्मि है
दो है ही नहीं.....
जब दो होंगे तभी, एक पूज्य होगा और एक पुजारी...
जब ये भेद ही मिट गया तब मैं उस ईश्वर को हर क्षण हर पल हर चीज़ में हर हाल में सिर्फ उसके ही आनंद में बसता हूँ.
 
इस सुन्दर रचना के लिए साधुवाद.
आदरणीया डॉ प्राची सिंह जी बहुत खूब सूरत  भावाभिव्यक्ति आप की ...हम अलग हैं कहाँ हम सब उसके अंश हैं  ईश्वर एक है दो चार नहीं ..सच कहा आपने ..जब ये भेद ही मिट गया तब मैं उस ईश्वर को हर क्षण हर पल हर चीज़ में हर हाल में सिर्फ उसके ही आनंद में बसता हूँ...अब लोग प्रश्न करते हैं की जब हम ही ईश्वर हैं या उसके अंश हैं तो हम गलत क्यों कर रहे हैं या वो ईश्वर हम से गलत करवाता ही क्यों हैं ?????
 ..जय श्री राधे 
भ्रमर ५ 
आ. सुरेन्द्र जी..
ईश्वर हममें ही विराजमान है या फिर हम हर पल उसमें ही अवस्थित हैं...... उसे पहचानना भर है,
ईश्वर एक energy है जो सिर्फ और सिर्फ positive है..
इश्वर हमसे गलत नहीं कराता.... उसने हमें चुनने का अधिकार दिया है, ये हम चुनते हैं... और ये "हम" सत्ता हमारी ego  है..
 
जब मैं , मैं नहीं रहता, मैं तुम हो जाता हूँ , तो मैं कभी गलत नहीं करता.
कुछ भी gross नहीं है..
जैसे अन्धकार, अन्धकार नहीं है... प्रकाश का ना होना है..
इसी तरह अपनी positivity  से दूर जाना ही negativity है , अन्यथा उसकी अपनी कोई सत्ता नहीं है..
 
हमारे अपने स्वार्थ, अपनी वासनाएं, अपने अज्ञान हमसे गलत करवाते हैं.... ईश्वर नहीं

जब मैं , मैं नहीं रहता, मैं तुम हो जाता हूँ , तो मैं कभी गलत नहीं करता.

आदरणीया डॉ प्राची जी ...सुविचार आप के सुन्दर विवेचना ....जब कुछ अच्छा होता है तो लोग खुद  अहम् से भरे ईश्वर बन ...ये मैंने किया वो मैंने किया बोलते हैं लेकिन जब गलत होता है दुःख उपजता है मृत्यु होती है तो सब के दायी ईश्वर ...सब उन के ऊपर थोप दिया जाता है ..कितने स्वार्थी हैं हम ..प्रभु सत्य है धनात्मक ऊर्जा है सब सच ही सिखाता है तो गलत करना पाप करना हमें कौन  और क्यों सिखाता है करने को , क्यों  ईश्वर ही इन सब पापों को आतताइयों को समाप्त नहीं कर रहा ??  लोगों को बड़ा भ्रम है ऐसा ...... ...जय श्री राधे 

  ..भ्रमर ५ bhramar ka dard aur darpan

 

ईश्वर एक चैतन्य है, उसमें स्पंदन से हर एक स्थूल व सूक्ष्म तत्व की उत्पत्ति हुई... ईश्वर नें हमें चुनने का अधिकार दिया, कर्म करने का अधिकार दिया.... और हमारे कर्मों में वो कभी हस्तक्षेप नहीं करता...

 
उसने हमें न तो पुण्य करने सिखाए न ही पाप...
 
हम उसके ही अंश हैं, अर्थात हम शान्ति, आनंद और पुण्य से ही बने हैं.. यही हमारा मूल स्वरुप है... तभी तो हम मूलत को पाने के लिए अन्तः-पिपासु हैं.
 
पर अपने चुनने के अधिकार का, अपनी इन्द्रियों के आसक्त हो कर गलत उपयोग करने और क्षणिक भोगों में आनंदित होने के कारण, हम अपने निज स्वरुप को भूल गए, और पुण्य से दूर होते गए.... इसे ही हम पाप की उत्पत्ति मान सकते हैं.....
 
ईश्वर पापियों को समाप्त क्यों नहीं कर रहा?
....... क्योकि पापी को भी चुनने का अधिकार दिया गया है, और ईश्वर कर्म में हस्तक्षेप नहीं करता... हाँ हमारे कर्म फलों का निर्धारण जरूर करता है. 
 ईश्वर अवसर भी अवश्य देता है, कि हम चुनना क्या चाहते हैं... पुण्य या पाप का मार्ग.
 
तभी तो हम अपने भविष्य के निर्माता स्वयं ही हैं.

ईश्वर अवसर भी अवश्य देता है, कि हम चुनना क्या चाहते हैं... पुण्य या पाप का मार्ग.

 

तभी तो हम अपने भविष्य के निर्माता स्वयं ही हैं.

आदरणीय डॉ प्राची जी बहुत सुन्दर व्याख्या आप की ...ईश्वर ने हमें भेजा है कुछ भूमिका निभाने को वह चुनने का अधिकार देता है कर्मों में रोक टोक नहीं करता और जब लोग क्षणिक भावों में खो पुन्य को भूल पथ से भटक अवांछनीय नकारात्मक कार्य करना शुरू कर देते हैं तो ही समझिये पाप का बीज जन्म ले लिया ...पाप बढ़ता जाता है कांटे उगते जाते हैं और इन काँटों की चपेट में बहुत से निरीह प्राणी भी आने लगते हैं 
डॉ प्राची जी जैसे हम अपने बच्चे को स्वछंदता देते हैं कुछ भी करता रहे प्यार ही करते हैं सब माफ़ ..लेकिन जब देखते हैं पथ भटक रहा है तो डांट डपट समझा बुझा उसे राह पर लाते हैं काफी कुछ हल हो जाता है बच्चा सुधर जाता है ....
लेकिन पाप इतना बढ़ रहा है कुछ लोग मक्खन मलाई खा आनंद का जीवन जी रहे हैं और भक्ति में लीन   ईमानदार, सज्जन, आतताइयों का शिकार हो दुःख भोग रहा है भिक्षाटन कर रहा है पीड़ा से सारा जीवन काटे जा रहा है क्या उस को अधिकार नहीं है की प्रभु परम पिता इस बेटे की भी सुने और उस बेटे को डांट डपट पाप की राह से हटायें ..अति विलम्ब क्यों ??? 
..  ..भ्रमर ५ 

आ. सुरेन्द्र शुक्ला जी...

कर्म का सिद्धांत समझना बहुत आवश्यक है...
ये ज़िन्दगी, हमारी देह के जन्म के साथ शुरू नहीं होती, न ही हमारी देह की मृत्यु के साथ समाप्त होती है...
हम अपने पूर्व जन्मों के कर्म के अनुसार ही जीवन में अनुभव प्राप्त करने आते हैं, ताकि कोई भी कर्म शेष न रह जाए, .... पर हम भूल जाते हैं कि हमारा जन्म लेने का उद्देश्य क्या है, और फिर नए कर्मों का संचय करना प्रारम्भ कर देते हैं. 
जब हमें ये कर्म जाल समझ आता है, तभी हम इससे मुक्त भी हो सकते हैं...
ईश्वर हमें सजा नहीं देता, हमारे कर्मों का फल ही हम भोगते हैं, जो हमे सजा लगता है....
विलम्ब .... या शीघ्रता ये मात्र हमारा अनुमान है.... क्योंकि वक़्त अपने आप में स्थिर है... पृथ्वी से ऊपर के आयामों ... में वक़्त ठहरा हुआ है,  कॉस्मिक चैतन्य के लिए वक़्त जैसी कोई चीज़ नहीं... वो बस स्थिर है, चिरादिकाल से, चिरादिकाल तक...
जो पाप का मार्ग चुनता है, वो साथ साथ ही अपने संचित कर्मों का भार बढ़ता जाता है, और तदनुरूप स्वयं ही फल भी अवश्य ही निर्धारित करता जाता  है. 
सादर.

ईश्वर हमें सजा नहीं देता, हमारे कर्मों का फल ही हम भोगते हैं, जो हमे सजा लगता है....

आदरणीया डॉ प्राची जी सच में कर्म प्रधान विश्व रचि राखा जो कहा गया है सच ही है अच्छी व्याखाया आप की ...ईश्वर हमें सजा नहीं देता कुछ लोग ऐसा मानते हैं लेकिन अधिकतर तो नहीं ..कुछ कहते हैं की यदि ये पाप करोगे तो ईश्वर तुम्हे इसकी सजा जरुर देगा .....

..हम भी इसमें ये विश्वास रखते हैं की ईश्वर धनात्मक है पुण्य है  पवित्र है ..बुरा तो कतई नहीं है तो हमें वो सजा क्यों देगा ..दूजी नजरों से घृणा से क्यों देखेगा अच्छे और बुरे में अंतर क्यों करेगा उसके ही अंश सब है सब ही उसकी संतान हैं सब कुछ उसका है सब में वो है सब उसमे ही हैं ...
कॉस्मिक चैतन्य के लिए वक़्त जैसी कोई चीज़ नहीं... वो बस स्थिर है, चिरादिकाल से, चिरादिकाल तक... वो सदा से है सदा रहेगा चिरंजीवी ...अनंत है चैतन्य है ..आपने जो कहा अनछुआ चैतन्य जहां हम पहुँच जाते हैं छूने लेकिन पुनः होता क्या है ईश्वर ही जानें ....
जो पाप का मार्ग चुनता है, वो साथ साथ ही अपने संचित कर्मों का भार बढ़ता जाता है, और तदनुरूप स्वयं ही फल भी अवश्य ही निर्धारित करता जाता  है.  
डॉ प्राची जी यदि केवल ऐसा ही हो तो कोई बात नहीं कोई बुरा काम किया पाप किया और भोगा ....लेकिन जब हम देखते हैं इस जगती में कि एक ईमानदार , सरल, सज्जन, तरह तरह के कष्ट पा रहा है दो जून कि रोटी तक मयस्सर नहीं है उसके बाल बच्चों को ..पढना लिखना तो दूर ..लोग उसको प्रताड़ित कर रहे हैं उसकी बालाएं  सताई जा रही हैं ...यही नहीं कितने बहुत सज्जन होते काल का ग्रास बन जा रहे हैं मार दिए जा रहे हैं जला दिए जा रहे हैं जनता के सामने ...तो दर्द उपजता है ..कि यदि ईश्वर है तो क्यों वो इस को रोकता नहीं  ?? ..रोके तो अच्छाइयों का सम्मान हो लोग पाप से डरें ...और ये जग सुन्दर न हो जाए ???
आभार ....भ्रमर ५ 

 

आ. सुरेन्द्र जी,
मैंने काफी कुछ ऊपर की टिप्पणियों में लिखा है... गहनता से जानने समझने पर शायद आप उत्तर पा जाएं....
ईश्वर की सृष्टि को यदि सिर्फ LOGIC  MIND  से समझने चलेंगे तो शायद १०% भी नहीं जान पायेंगे.... क्योंकि MIND  की अपनी सीमाएं हैं.
ज्यादा नहीं कहना चाहूंगी. सादर.

ईश्वर की सृष्टि को यदि सिर्फ LOGIC  MIND  से समझने चलेंगे तो शायद १०% भी नहीं जान पायेंगे.... क्योंकि MIND  की अपनी सीमाएं हैं.

आदरणीया डॉ प्राची जी सच कहा आप ने ...किसी चीज के पीछे यदि हाथ धो पड़े रहें यों ही तो विराम नहीं लगने वाला और वो तो अनन्त है असीम है हम हमारा मन मष्तिष्क उस को जानने समझने की क्षमता रखता है कहाँ है बहुत कुछ स्वीकार करने पर सहज हो जाता है नमन उस अलौकिक ईश को और आप को भी ..बहुत समय दिया आप ने भी ....आभार 
हरी ओउम 
भ्रमर ५ 

 

RSS

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत रचना की सारगर्भित समीक्षा कर आपने मेरे सृजन कार्य को सार्थकता…"
Saturday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"परम आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम - सर सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार…"
Friday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"वायव्य दशा के प्रस्तुतीकरण के क्रम में बना विश्वास प्रस्तुति की शाब्दिकता को स्थापित करता हुआ सफल…"
Friday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"संसार का मंच एक गंभीर विषय है. तदनुरूप आपका प्रयास श्लाघनीय है, आदरणीय सुशील सरना जी.  कई…"
Friday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय अशोक भाईजी, कितनी निष्कपट, कितनी भोली, कितनी सरस कविता हुई है ! जैसे, कोई अबोध बच्चा…"
Friday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"आदरणीय  अशोक रक्ताले जी सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार आदरणीय…"
Thursday
Ashok Kumar Raktale commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"चुप रहिए...  वाह  क्या रदीफ़ है, इसे देखकर ही मैं हाज़िर हो गया.  रहना हो भारत में…"
Jul 5
Ashok Kumar Raktale commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"अभिनय करते मंच पर, माटी के किरदार ।जीवन की अनुभूतियाँ, करते वो साकार ।।.....सच है अभिनय जीवन की…"
Jul 5
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

बरसात

बरसात घन गरजे अंधियारी छाई,बिजली अम्बर पर इठलाई  बूँदें टपकी टप-टप भाईरिमझिम रिमझिम बारिश आई पत्ते…See More
Jul 5
vijay nikore replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"Dear respected Admin team: A few minutes ago, I typed my suggestion, but lost it all before it was…"
Jul 5
vijay nikore replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"..."
Jul 5
Chetan Prakash replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"  आदरणीय,  तकनीकी दृष्टिकोण से मैं कुछ  अधिक नहीं कह सकता । किन्तु यदि हमारा …"
Jun 14

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service