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कुकुभ छन्द अर्द्धमात्रिक छन्द है. इस छन्द में चार पद होते हैं तथा प्रति पद 30 मात्राएँ होती हैं.

प्रत्येक पद में दो चरण होते हैं जिनकी यति 16-14 निर्धारित होती है. अर्थात विषम चरण 16 मात्राओं का और सम चरण 14 मात्राओं का होता है.

दो-दो पदों की तुकान्तता का नियम है.
प्रथम चरण यानि विषम चरण के अन्त को लेकर कोई विशेष आग्रह नहीं है. किन्तु, पदान्त दो गुरुओं से होना अनिवार्य है. इसका अर्थ यह हुआ कि सम चरण का अन्त दो गुरु से ही होना चाहिये.

महाराष्ट्र के प्रसिद्ध लावणी नृत्य के साथ गाये जाने वाले लोकगीत इसी छन्द में निबद्ध होते हैं. इन गीतों के पदान्त दो लघुओं के बाद दो गुरुओं से होता है. अर्थात ये कुकुभ छन्द के ही प्रारूप हैं.

कुकुभ छन्द का उदाहरण -

मानव मूल्य गिरे नित नीचे, भ्रष्टाचार उठा ऊँचा !
अपनी-अपनी डफली सबकी, अपना-अपना है कूंचा !!
किससे कहें वेदना मन की, अब कैसे भाग्य जगायें!
अन्धकार के जंगल में हम,अब कैसे आग लगायें !!   (राज बुन्देली)

****
(मौलिक और अप्रकाशित)

ज्ञातव्य : आलेख अबतक उपलब्ध जानकारी के आधार पर प्रस्तुत हुआ है.

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Replies to This Discussion

आदरणीय सौरभ भाईजी, 

नित नये छंदों से परिचय कराने के लिए हृदय से आभार। कुकुभ छंद के नियम भी सरल हैं , कहीं कोई घुमावदार  ' गुगली ' नहीं ।

अंतिम पंक्ति में प्रवाह बाधक है।   /// हम अन्धकार के जंगल में ,अब कैसे आग लगायें !! ///

सादर 

आदरणीय  सौरभ जी

आपने जो उदहारण दिया है उसकी अंतिम दो पंक्तियों में प्रवाह बाधित प्रतीत होता है i ये पंक्तिया क्रम परिवर्तन से  निम्न प्रकार हो तो प्रवाह  बाधित नहीं होगा-

किससे कहें वेदना मन की, भाग्य जगायें अब कैसे

अन्धकार के जंगल में हम, आग लगायें अब कैसे

आपका मार्ग दर्शन अपेक्षित है i सादर i

यह एक शुभ संकेत है कि उदाहरण के तौर पर भाई राज बुन्देली की हालिया छन्द-रचना की गेयता पर मीमांसाएँ आ रही हैं. विश्वास है, इस बार के छन्दोत्सव में सुगढ़ रचनाओं से मन आह्लादित रहेगा.

सादर आभार आदरणीय अखिलेश भाईजी तथा आदरणीय गोपाल नारायनजी.

आ.सौरभ जी कृपया आप मात्रा सहित छन्द का उदाहरण दे मुझे समझने में थोड़ी आसानी होगी | 

भाई महर्षिजी, कल रात १२ बजे से ’चित्र से काव्य तक’ छन्दोत्सव का अंक ४६ प्रारम्भ हो चुका है. इस बार का छन्द कुकुभ ही है. आप आयोजन में शिरकत करें और प्रस्तुत हुई रचनाओं को देखें. इससे बढिया कार्यशाला और कहाँ या कैसी होगी ?
आपने अपना यही प्रश्न इस आयोजन में करें तो आपके माध्यम से बेहतर संवाद स्थापित होगा. ऐसे संवाद सार्थक परिचर्चा का कारण होते हैं. ऐसी परिचर्चाओं से अन्यान्य जिज्ञासु पाठकों को लाभ होता है.   

आपको भी ज्ञात है, इस माह का छन्दोत्सव अंक ४६ शनिवार दिनांक २१ फरवरी की रात १२ को समाप्त होगा.  

शुभेच्छाएँ.

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