For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

शिवना प्रकाशन, सीहोर, मप्र के सौजन्य से सद्यः लोकार्पित ग़ज़ल-संग्रह ’डाली मोगरे की’ हाथों में है. इस पुस्तक का कलेवर, इसकी साज-सज्जा, रंग-संयोजन और तदनुरूप प्रथम-दृष्ट्या पड़ने वाला प्रभाव किसी पाठक को एकदम से सम्मोहित कर लेने में सक्षम है. प्रस्तुत ग़ज़ल-संग्रह ग़ज़लकार की पहली पुस्तक है. किन्तु, किसी पहले संग्रह से इस तथ्य का अनुमान कदापि नहीं बनना चाहिये कि पाठक के तौर पर हम ग़ज़लकार की सोच के नन्हें परिन्दे की पहली उड़ानों का गवाह बनने जा रहे हैं. तब तो और भी नहीं जब उस ग़ज़लकार को अदब का संसार नीरज गोस्वामी के नाम से जानता हो. नीरजजी ने अपने पहले संग्रह में बेशक तनिक समय लिया है, किन्तु इस संग्रह से गुजरने के बाद इस बात की आश्वस्ति भी होती है कि उन्होंने न केवल मनोयोग से आवश्यक तैयारी की है, बल्कि प्रस्तुतियों की संप्रेषणीयता के अन्यान्य पहलुओं पर अपनी समझ को केन्द्रित किया है. साहित्य की इस विधा के प्रति नीरजजी के लगाव का विस्तार जितना क्षैतिज है, साहित्यिक समझ, विशेषकर ग़ज़लों के प्रति, निर्विवाद रूप से उतनी ही गहरी है.

 

सामाजिक विसंगतियों के प्रति आप जितना संवेदनशील और प्रतिकारी दिखते हैं, ग़ज़लों में प्रयुक्त होने वाले शब्दों के प्रति आपकी तार्किक ग्राह्यता उतनी ही आग्रही प्रतीत होती है. बार-बार यह महसूस होता है कि आपकी ग़ज़लें परंपराओं की सकारात्मकता तथा अनुभूत वर्तमान के विभिन्न आयामों को संप्रेषित करने के क्रम में अप्रासंगिक हो गये शब्दों के प्रारूपों को बलात ढोने की विवशता नहीं पालतीं, बल्कि, अपनी सचेत अनुभूतियों को साझा करने के लिए आपकी ग़ज़लें अपने आस-पास के उर्वर वातावरण में अनायास उपलब्ध किन्तु सक्षम शब्दों से प्राण पाती हैं. यह वस्तुतः किसी ग़ज़लकार की भाषाय़ी तौर पर दृढ इच्छा शक्ति का परिचायक है.

 

ये असर हम पर हुआ है दौर का

भावना दिल की मवाली हो गयी !

 

तलाशो मत तपिश रिश्तों में यारो

शुकर करिये अगर वो गुनगुने हैं.

 

दूर होठों से तराने हो गये

हम भी आखिर को सयाने हो गये

 

रात भर आरी चलायी याद ने

रात भर ख़ामोश हम चिरते रहे

 

ग़ज़ल का पारंपरिक स्वरूप भले ही एक लम्बे अरसे तक एक ओर वायव्य तो दूसरी ओर कायिक प्रेम के पलड़े में तुलता और अनुमोदन पाता रहा हो, परन्तु आजका ग़ज़लकार अपने संप्रेषणों को ऐसे किसी श्रेणीबद्ध संकोच से कबका अलग कर चुका है. नयी पीढ़ी के ग़ज़लकारों की प्रस्तुतियों में भावनाओं के विभिन्न आयामों के उद्वेग बलवती दिखते हैं. यही आज की ग़ज़लों की जीवनी-शक्ति भी हैं. ग़ज़लगोई का यह नया ढंग ग़ज़ल की विधा में आया अबतक का सबसे रोचक और सकारात्मक बदलाव है. नीरजजी ग़ज़ल के इस व्यवहार को खूब समझते हैं, तभी तो उनकी ग़ज़लों का कथ्य शब्दों से, और बिम्बों से भी, बहुआयामी विस्तार पाता है. तभी आप अपनी ग़ज़लों में प्रेम-महीनी के नाम पर जुगुप्साकारी, स्वार्थ में गहरे लिप्त, खाये-पीये-अघाये समाज की विलासी भावनाओं को स्वर न दे कर आम-जन की अपेक्षाओं और सोच को सुर देना अधिक श्रेयस्कर समझते हैं.

 

चैन चलो पाया कुछ तो

जब भी पूजा पत्थर को

 

जो देखा, सच बोल दिया

तुम क्या नन्हें-मुन्ने हो ?

 

दुश्वारियाँ हयात की सब भूलभाल कर

मुमकिन नहीं है डूबना तेरे ख़ुमार में

 

आप बेहतर है कि मेरे काम ही आये नहीं

ग़र दबाना चाहते हैं बाद में एहसान से

 

नीरजजी अपने आस-पास के जीवन-प्रवाह को महसूस ही नहीं करते हैं, जीते हैं. आम-जन के दैनिक क्रियाकलापों, उसके सुखों-दुखों को, उसकी कोमल भावनाओं को, उसके समाज की विसंगतियों को खूब बूझते हुए उनमें समरस रहते हैं.

 

बाज़ार के भावों पे नज़र जिसकी टिकी है

चाँदी में नहाया न उसे ताज दिखाओ

 

शाम से ही आ रही हैं हिचकियाँ

गीत मेरा गुनगुनाता कौन है !

 

बिन तुम्हारे ख़ैरियत की बात भी

पूछते जब लोग तो ताने लगे 

 

आप खुश हैं मेरे बग़ैर अगर

अश्क छुप-छुप के क्यूँ बहाते हैं

 

ग़ैर का साथ ग़ैर के किस्से

ये तो हद हो गयी सताने की

 

दिल मिले दिल से फ़कत इतना ज़रूरी है मियाँ

क्यूँ मिलाते फिर रहे हो प्यार में तुम राशियाँ

 

नीरजजी का पहला ग़ज़ल-संग्रह उनके व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं, यथा, वैयक्तिक, सामाजिक, मानवीय, मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक आदि, को परखने के क्षण उपलब्ध कराता है. तभी तो यह तथ्य निर्विवाद रूप से सामने आता है कि आप जहाँ अपने बहुआयामी अनुभवों की दृष्टि से घटनाओं और उसके कारकों को परखते हैं, वहीं इस भूभाग की समृद्ध परंपराओं के उज्ज्वल पक्ष को सहज स्वीकार करने-करवाने के आग्रही भी हैं, इसकी सतत सबलता के पक्षधर भी हैं.

 

दौड़ हम हारते नहीं लेकिन

थम गये थे तुझे उठाने को

 

बढ़ के कोई पाँव छूता है बुज़ुर्ग़ों के अगर

लोग रह जाते हैं उसको देख कर हैरान से

 

किसको फुर्सत आजके इस दौर में

रूठ जाने पर मनाता कौन है ?

 

किन रिश्तों की बात करें

सबमें दिखती पोल मियाँ

 

संग्रह की ग़ज़लों का मूल स्वर प्रकृति के विभिन्न कोशों से प्राण पाता हुआ दीखता अवश्य है, परन्तु उनका निहितार्थ रुमानी बिम्बों में ही उलझ कर नहीं रह जाता, बल्कि ग़ज़लों का स्वर प्रकृति के अवयवों का प्रयोग कर आजके क्लांत मनुष्य की ऊसर वैचारिकता को आर्द्र करने हेतु टेर लगाता है.

 

खिड़कियों से झाँकना बेकार है

बारिशों में भीग जाना सीखिये

 

खार पर तितलियाँ नहीं आतीं

फूल सा मुस्कुराइये साहब

 

नजाकत है न खुश्बू औ’ न कोई दिलकशी ही है

गुलों के साथ फिर भी खार को रब ने जगह दी है

 

मेघ छायें तो मगन हो नाचता

आज के इन्सां से बेहतर मोर हैं

 

खुश्बू फूलों की ही तय करती है उनकी कीमतें

क्या कभी तुमने सुना है, ख़ार का सौदा हुआ

 

वहीं कुछ शेर इस तौरपर भी, जहाँ ग़ज़लकार प्रकृति से अनवरत अपेक्षाओं के सापेक्ष प्राप्य के प्रति कृतज्ञता के भाव को वरीयता देता है -

 

फूल तितली रंग खुश्बू जल हवा धरती गगन

सब दिया रब ने नहीं पर हम झुके आभार से 

या,

आह पानी हवा ज़मीन फ़लक

और क्या चाहिये बता रब से ?

 

जिस लिहाज़ से नीरजजी ने ज़िन्दग़ी को जीया है, वे अनुभवों की अतुल्य समृद्धि के धनी न हों, यह हो ही नहीं सकता है. सीखे और समझे हुए को साझा करना मानवीय कर्तव्य का सबसे सकारात्मक पहलू है. इस साझा करने में भाषा अक्सर स्वतंत्र हो जाती है, अंदाज़ फक्कड़ हो जाता है. आश्चर्य नहीं कि रह-रह कर आपके कहे में कई बार कबीर बोल उठते हैं, तो कभी रैदास जी उठते हैं.

 

बोल कर सच यही सुना सबसे

यार तेरी ज़बान काली है

 

देने वाला घर बैठे भी देता है

दर-दर हाथों को फैलाना ठीक नहीं

 

न समझे किसी को मुकाबिल जो अपने

वही देख शीशा बड़े सकपकाये

 

इसमें संदेह नहीं कि नीरजजी की अभिव्यक्ति का मूल भी हर सचेत किन्तु सहज ग़ज़लकार की प्रस्तुतियों के मूल की तरह व्यक्तिगत अनुभूत भावनाएँ ही है.

 

बहुत बातें छुपी हैं दिल में अपने

कभी तुम पास बैठो तो सुनायें

 

इसी क्रम में, यह भी स्पष्ट है कि नीरजजी विद्रुप परिपाटियों के विरुद्ध खासे मुखर हैं. लेकिन उनके लिए व्यवस्था की सारी सड़कें दिल्ली हो कर ही गुजरती हैं, ऐसा भी नहीं है. अलबत्ता, राजनीति का हालिया दौर बार-बार उनकी संवेदना को झकझोरता ज़रूर है. समाज और तंत्र में व्यापी अव्यवस्था से आपकी संवेदना अपनी दृष्टि फेरती नहीं. यही तो एक सचेत साहित्यकार का समाज के प्रति दायित्वबोध है.

 

ये कैसे रहनुमा तुमने चुने हैं

किसी के हाथ के जो झुनझुने हैं

 

देश के हालत बदतर हैं, सभी ने ये कहा

पर नहीं बतला सका, कोई भी अपनी भूमिका

 

ये कैसा दौर आया है, सरों पर ताज है उनके

नहीं मालूम जिनको फ़र्क़ पत्थर औ’ नगीने में

 

ये दौड़ है चूहों की यही इसका नियम है

आगे जो बढ़े सारे उसे मिल के गिराओ

 

वहीं, अनमनाये क्षणों की बदहवासी के आलम में आपका ग़ज़लकार बेसाख़्ता बोल उठता है -

अगर ये फ़सादों की जड़ बन गये

ये झंडे ही क्यूँ न मिटा कर चलें

 

गुरु-गंभीरता जहाँ किसी अध्ययनप्रिय व्यक्तित्व का अहम हिस्सा होती है, वहीं एक सीमा के बाद यही गहन अध्ययन मन-मस्तिष्क के समस्त कपाटों को खोल कर उत्फुल्ल जीवन जीने का कारण बन जाता है. समस्त भेद-विभेद से निर्लिप्त, इनसे परे. ऐसा व्यक्तित्व बलौस, बेतक़ल्लुफ़ या बेफ़िक़्र ज़िन्दग़ी का मज़ा लेता हुआ जीता है. वस्तुतः यह सचेत चित्त के भौतिक स्वरूप का धुर सकारात्मक आयाम और इस जीवन शैली की अभिनव पराकाष्ठा हुआ करती है. इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाय तो नीरजजी जीवन को बूझने के क्रम में जितना विन्दुवत निरीक्षण की महत्ता को स्वीकारते हैं, उसी लिहाज़ में अध्ययनप्रिय जीवन को जीते हैं. जबकि दूसरी ओर उनका दिल खुले आम दिल हसरतों की इमलियाँ गिरने लगीं तब पेड़ से गाता दिखता है !  यह किसी व्यक्तित्व का कोई कण्ट्रास्स्ट कत्तई नहीं है.

 

ज़िन्दग़ी की रेस में दौड़ते बेशक़ रहो

पर चले मत दूर जाना खुद की ही पहचान से

 

इक ख़बर दब गयी सबको मालूम है

इश्तिहारों भरा आज अख़बार है..

 

बात नज़रों से ही होती है मियाँ

जो ज़बां से हो वो ’नीर’ शोर है

 

लेकिन, नीरजजी के जिस गुण ने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया है वह है वृत्तियों को उर्ध्वगामी रखने का उनका आधिकारिक प्रयास. व्यक्तित्व के पंच-कोशों के प्रथम सोपान पर ही आपका ग़ज़लकार उलझा नहीं रहता, जैसा कि मानवीय अनुभूतियों को अभिव्यक्त करने के क्रम में रचनाकारों की अक्सर दशा हुआ करती है. आप वैचारिकता को मात्र उलाहनाकारी नहीं रहने देते. आपके ग़ज़लकार का व्यक्तित्व समस्त प्रभावों और उद्वेगों को भोगता हुआ भी इनसे लगभग असंपृक्त दिखता है. हताशा, उत्साह या अपेक्षाओं को विवेचित करने के क्रम में आप इसके मूल कारणों को बूझने का अगर प्रयास करते हैं तो इसका कारण आपकी आध्यात्मिकता ही है. आध्यात्मिकता व्यक्ति और समाज को झूठे दिलासों के आवरण नहीं दिया करती, जैसा कि अपने समाज में एक स्कूल द्वारा बहुप्रचारित कर इसकी अवधारणा पर ही सायास आघात किया जाता है. बल्कि यह आध्यात्मिकता ही है जो आम-जन को सफलता और असफलता को स्वीकारने की चैतन्य क्षमता देती है. सोच को सजगता और वैचारिकता को सार्थकता देती है. विडंबनाओं की चिलचिलाती धूप में सांत्वनाओं और शुभकामनाओं के आँचल की आत्मीय छाया देती है. यही आध्यात्मिकता भारतीय जन-मानस की कालजयी निरंतरता का प्रमुख कारण है. आध्यात्मिक सोच के कारण ही भेद के सापेक्ष सार्थक विभेद तथा वाद के सम्मुख विन्दुवत प्रतिवाद की तीक्ष्ण समझ को सांस्कारिक स्वर मिलता रहा है.

 

फूल हो या ख़ार अपने वास्ते है एक सा

जो अता कर दे ख़ुदा हमको सदा वो भायेगा

 

नाम तो लेता नहीं मेरा मगर लगता है ये

रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से

 

कौन है ? क्यूँ है ? कहाँ जाना हमें ?

इन सवालों पर सदा घिरते रहे

 

लगा गलने ये चमड़े का लबादा

चलो बदलें, रफ़ू कब तक करायें

 

आदि शंकर के रज्ज्वांभुजंगमिव प्रतिभासितं वै...  को कितनी सहजता किन्तु कितनी मुखरता से आपका ग़ज़लकार सस्वर करता है -

 

साँप, रस्सी को समझ डरते रहे

और सारी ज़िन्दग़ी मरते रहे

 

विचारों से इतना गहन, समझ से इतना स्पष्ट वस्तुतः वही हो सकता है जिसके मस्तिष्क में सोद्येश्य तार्किकता तो होती ही है, जिसके हृदय में बच्चे का अबोधपन भी प्राणवान रहता है.

 

कहीं बच्चों सी किलकारी, कहीं यादों की फुलवारी

मेरी ग़ज़लों में बस ’नीरज’ यही सामान होता है.

 

होशियारी भी ज़रूरी मानते हैं हम मगर

लुत्फ़ आता ज़िन्दग़ी में जब करें नादानियाँ

 

गीत बचपन के वे सुहाने से

गुनगुनाओ किसी बहाने से

 

किलकारियाँ दबती हैं कभी ग़ौर से देखो

बस्तों से किताबों का ज़रा बोझ घटाओ

 

इतना ही नही, आपका मानना यह भी है, कि बोलचाल के अपने-अपने से शब्द यदि आपसी ग़ुफ़्तग़ू में न प्रयुक्त होंगे तो आखिर कहाँ होंगे ? सही कहा जाय तो आपके अपने शब्द और आपकी विशिष्ट शैली ही कई अर्थों में आपकी संप्रेषणीयता की शक्ति हैं. नीरजजी अपने इन्हीं शब्दों के सहारे अलमस्त ठहाके लगाते हुए क्या नहीं समझा जाते हैं -

 

देश जले नेता खेलें

अक्कड़-बक्कड़ बम्बे बो

 

प्यार अगर लफड़ा है तो

ये लफड़ा वरदान भिड़ू

 

लोग सीढ़ी हैं काम में ले लो

पाठ बचपन से ये रटेला है

 

पत्थरों से दोस्ती कर ली है जबसे

आईने पहचान खोते जा रहे हैं

 

आँखें करती हैं बातें

मुँह करता लफ़्फ़ाज़ी है

 

संग्रह के शेर-दर-शेर गुजरते हुए यह महसूस होता है, कि इस ग़ज़ल-समुच्चय में अपनापन को मान मिला है, साफ़गोई को स्वीकार्यता मिली है, क्लिष्ट विसंगतियों के विरोध को सहज शाब्दिक स्वरूप मिला है. कई-कई बार तो कथ्य की स्पष्टता इतनी मुखर हो जाती है कि प्रस्तुतियों के मिसरों के सपाटपन तारी हो जाने का भ्रम हो जाता है. लेकिन, इस गहन पढ़ाकू और अन्यान्य ग़ज़लकारों के ग़ज़ल-संग्रहों के मिसरों में खोये और उन पर बेबाक तब्सिरा करते व्यक्तित्व के कहे पर ऐसे भ्रम पाल लेना न केवल महती भूल होगी, बल्कि नीरजजी के संप्रेषण वैशिष्ट्य के प्रति ज्यादती भी होगी. आग्रही पाठकों को ग़ज़ल के ये अंदाज़ समझने ही होंगे. नितांत आपसी बातचीत कभी वायव्य बिम्बों को इंगित करती साझा नहीं हुआ करती. ग़ज़ल यदि परस्पर बातचीत का प्रारूप है तो समझना होगा कि नीरजजी की बातचीत आजके दौर के पाठकों से है, जहाँ समय की कमी का रोना सभी के पास है. बातें स्पष्ट हों तभी सुहाती हैं. ग़ज़लकार के ही शब्दों में सुनें -

 

ख़ामोशी से आज सुनता कौन है

शोर महफ़िल में मचाना सीखिये

 

शुभ मुहूरत की राह मत देखो

मन में ठानी है तो करो अब से

 

हाँ, यह अवश्य है कि हमारे आस-पास पसरे पड़े विस्तृत जीवन के कई-कई आयाम हैं जिनकी अवगुंठित पँखुड़ियाँ आने वाले समय में आपकी ग़ज़लों के सार्थक अश’आर का रूप धरे एक-एक कर खुलती जायेंगीं. यह भी प्रतीक्षित है. तब तक मैं नीरज गोस्वामी के इसी संग्रह के निम्नलिखित शेर से अपने कहे को हार्दिक शुभकामनाओं के साथ विराम देना चाहूँगा.

 

इक ग़ुज़ारिश है कि तुम इनको सँभाले रखना

दिल के रिश्ते हैं ये मुश्किल से बना करते हैं

 

सच कहूँ तो सफल वो ग़ज़ल है जिसे

लोग गाते रहें गुनगुनाते रहें

 

98 ग़ज़लों के इस सजिल्द ग़ज़ल-संग्रह में कुल 104 पेज हैं.

कोई औपचारिक भूमिका या प्राक्कथन नहीं है.

और, इसका प्रिण्ट मूल्य रु. 150/ रखा गया है.

 

***********

-- सौरभ पाण्डेय

***********

 

Views: 938

Replies to This Discussion

बड़ी बेबाकी से लिखी गई ईमानदार समीक्षा है। ग़ज़लकार और समीक्षाकार दोनों को बहुत बहुत बधाई

समीक्षा प्रयास के प्रति सकारात्मक भाव रखने और इसे अनुमोदित करने के लिए सादर धन्यवाद आदरणीय धर्मेद्र जी.

RSS

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

नादिर ख़ान replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-104
"इस कदर फित्नो में उलझे कि ये हम भूल गएकिस तरफ चल पड़े हम, और किधर जाना था जनाब शिज्जु साहब उम्दा बात…"
1 minute ago
नादिर ख़ान replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-104
"यार,ख़ुशबू का मुक़द्दर ही यही है उसकोजिस तरफ़ लेके हवा जाए उधर जाना था...जनाब आसिफ ज़ैदी साहब उम्दा गज़ल…"
3 minutes ago
Asif zaidi replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-104
"मोहतरम जनाब मिर्ज़ा जावेद बेग साहब आदाब ख़ूबसूरत ग़ज़ल की ढेर सारी मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाएं सादर"
25 minutes ago
rakesh gupta replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-104
"आदरणीय कृपया मार्गदर्शन करते हुए इन्ही भावों को व्यक्त करते हुए गजल कैसे बन पाएगी बताएं।"
33 minutes ago
rakesh gupta replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-104
"आदरणीय कबीर साहब, मैं मानता हूँ यह गजल के मापदंडों पर सम्भवतः यह खरी ना उतरे। आप लोग सिखाएंगे तो…"
41 minutes ago
Samar kabeer replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-104
"जनाब राकेश गुप्ता जी आदाब,ग़ज़ल अभी बहुत समय चाहती है,बह्र,शिल्प,व्याकरण पर आपको अभी बहुत अभ्यास की…"
54 minutes ago
rakesh gupta replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-104
"अंतिम लाइन का पहला शब्द मुझको पड़ा जाए, मझको नही , टायपिंग मिस्टेक है। सादर"
55 minutes ago
Samar kabeer replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-104
"जनाब आसिफ़ ज़ैदी साहिब आदाब,अच्छी ग़ज़ल कही आपने,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।"
59 minutes ago
Samar kabeer replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-104
"अच्छा सुझाव है ।"
1 hour ago
Samar kabeer replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-104
"ऊला में 'उठकर' शब्द भर्ती का है,ऊला यूँ कर लें:- 'आप ने कह तो दिया है,मुझे घर जाना…"
1 hour ago
rakesh gupta replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-104
"तूने ठाना आदिल, तुझको उधर जाना था, उनकी चाहत थी, तुझको मर जाना था। ** पाले पत्थरबाज, होली खून की वो…"
1 hour ago
Asif zaidi replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-104
"मोहतरम जनाब SHARIF AHMED QADRI "HASRAT" साहब आदाब बहुत ख़ूबसूरत अशआर, ग़ज़ल के लिए…"
1 hour ago

© 2019   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service