Tags: कॉमिक्स
Permalink Reply by Saurabh Pandey on February 24, 2012 at 4:29am इस प्रयास के लिये शुभकामनाएँ.
वैसे, रचना की कहन अच्छी है लेकिन लेखन पर अभी बहुत प्रयास करना है. अभी कई अशुद्धियाँ रह गयी हैं.जो खलती हैं. इस रचना को आपने बाल-साहित्य के अंतर्गत पोस्ट किया है, उस लिहाज आखीर की कुछ पंक्तियाँ एकदम से खटक रही हैं. रचना-लेखन मात्र भाव प्रस्तुतिकरण न होकर साधना और उत्तरदायित्त्व भी है. बाल साहित्य अनगढ़ रचनाओं के लिये मंच नहीं हुआ करता.
शुभेच्छा
Permalink Reply by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on February 24, 2012 at 7:21am इस मार्ग निर्देशन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी!वास्तव में इस रचना से ज्यादा अनगढ़ अभी मेरी रचनाधर्मिता है, इसे भी परिष्कृत करने की आवश्कता है जो आप जैसे पारखियों के द्वारा ही सम्भव है।
पूज्य सौरभ जी क्या आपको मैं अपना साहित्यिक गुरू मानने का अधिकारी हूँ।यदि आप ऐसा कुछ स्वीकार करते हैं तो आप से निवेदन है कि अपना आशीर्वाद प्रेषित करने और समय समय पर मार्ग निर्देशन करने की कृपा कीजिएगा।
पूज्य गुरुदेव को पुनश्च प्रणाम।
(यह रचना बहुत पुरानी है शायद मैंने कक्षा-10 में लिखा था किन्तु परखी नजर न होने के कारण मैं इसकी कमियों को पहचान न सका।)
एडमिन से मेरा सादर निवेदन है कि गलत व खटकने वाली पक्तियों को तुरंत हटा दें।
Permalink Reply by rajesh kumari on February 24, 2012 at 9:19am मैं सौरभ जी की बात से सहमत हूँ आपकी कविता का भाव बहुत अच्छा है एक कोमल हर्दय को परिस्थितियों के समक्ष मर्माहत होते हुए गलत राह पर पड़ जाने पर मन को उद्वेलित होते हुए दर्शाया गया है आप इस कविता को बच्चों के कक्षा की बजाय सामाजिक व्यंग के रूप में डालेंगे तो ठीक रहेगा आपका प्रयास बहुत सराहनीय है.
Permalink Reply by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on February 24, 2012 at 12:56pm आवश्यक सूचना:-
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