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"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187

ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरे के 187 वें अंक में आपका हार्दिक स्वागत है |

इस बार का मिसरा आज के दौर के मशहूर शायर जनाब इरफ़ान सिद्दीक़ी साहब की ग़ज़ल से लिया गया है।

तरही मिसरा है:

“अस्ल जंजीर तो सामान-ए-सफ़र है साईं”

बह्र 2122, 1122, 1122, 112/22

अर्थात् फ़ायलातुन्, फ़ियलातुन् फ़ियलातुन्, फ़यलुन् है।

रदीफ़ है “है साईं” और क़ाफ़िया है ‘अर’ का स्वर

क़ाफ़िया के कुछ उदाहरण हैं, अगर, अधर, अमर, असर, इधर, उतर, खबर, डगर, नगर, नजर, पहर, मगर, लहर आदि उदाहरण के रूप में, मूल ग़ज़ल यथावत दी जा रही है।

मूल ग़ज़ल यह है:

देख ले ख़ाक है कासे में कि ज़र है साईं

दस्त-ए-दादार बड़ा शो'बदा-गर है साईं

तू मुझे उस के ख़म-ओ-पेच बताता क्या है

कू-ए-क़ातिल तो मिरी राहगुज़र है साईं

शहर-ओ-सहरा तो हैं इंसानों के रक्खे हुए नाम

घर वहीं है दिल-ए-दीवाना जिधर है साईं

पाँव की फ़िक्र न कर बार-ए-कम-ओ-बेश उतार

अस्ल जंजीर तो सामान-ए-सफ़र है साईं

शा'इरी कौन करामत है मगर क्या कीजे

दर्द है दिल में सो लफ़्ज़ों में असर है साईं

'इश्क़ में कहते हैं फ़रहाद ने काटा था पहाड़

हम ने दिन काट दिए ये भी हुनर है साईं


मुशायरे की अवधि केवल दो दिन होगी । मुशायरे की शुरुआत दिनांक 28 जनवरी दिन बुधवार के प्रारंभ के साथ हो जाएगी और दिनांक 29 जनवरी दिन गुरुवार के समाप्त होते ही मुशायरे का समापन कर दिया जायेगा.

नियम एवं शर्तें:-

"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" में प्रति सदस्य अधिकतम एक ग़ज़ल ही प्रस्तुत की जा सकेगी |

एक ग़ज़ल में कम से कम 5 और ज्यादा से ज्यादा 11 अशआर ही होने चाहिए |

तरही मिसरा मतले को छोड़कर पूरी ग़ज़ल में कहीं न कहीं अवश्य इस्तेमाल करें | बिना तरही मिसरे वाली ग़ज़ल को स्थान नहीं दिया जायेगा |

शायरों से निवेदन है कि अपनी ग़ज़ल अच्छी तरह से देवनागरी के फ़ण्ट में टाइप कर लेफ्ट एलाइन, काले रंग एवं नॉन बोल्ड टेक्स्ट में ही पोस्ट करें | इमेज या ग़ज़ल का स्कैन रूप स्वीकार्य नहीं है |

ग़ज़ल पोस्ट करते समय कोई भूमिका न लिखें, सीधे ग़ज़ल पोस्ट करें, अंत में अपना नाम, पता, फोन नंबर, दिनांक अथवा किसी भी प्रकार के सिम्बल आदि भी न लगाएं | ग़ज़ल के अंत में मंच के नियमानुसार केवल "मौलिक व अप्रकाशित" लिखें |

वे साथी जो ग़ज़ल विधा के जानकार नहीं, अपनी रचना वरिष्ठ साथी की इस्लाह लेकर ही प्रस्तुत करें

नियम विरूद्ध, अस्तरीय ग़ज़लें और बेबहर मिसरों वाले शेर बिना किसी सूचना से हटाये जा सकते हैं जिस पर कोई आपत्ति स्वीकार्य नहीं होगी |

ग़ज़ल केवल स्वयं के प्रोफाइल से ही पोस्ट करें, किसी सदस्य की ग़ज़ल किसी अन्य सदस्य द्वारा पोस्ट नहीं की जाएगी ।

विशेष अनुरोध:-

सदस्यों से विशेष अनुरोध है कि ग़ज़लों में बार बार संशोधन की गुजारिश न करें | ग़ज़ल को पोस्ट करते समय अच्छी तरह से पढ़कर टंकण की त्रुटियां अवश्य दूर कर लें | मुशायरे के दौरान होने वाली चर्चा में आये सुझावों को एक जगह नोट करते रहें और संकलन आ जाने पर किसी भी समय संशोधन का अनुरोध प्रस्तुत करें | 

मुशायरे के सम्बन्ध मे किसी तरह की जानकारी हेतु नीचे दिये लिंक पर पूछताछ की जा सकती है....

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मंच संचालक

तिलक राज कपूर

(वरिष्ठ सदस्य)

ओपन बुक्स ऑनलाइन डॉट कॉम

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Replies to This Discussion

ग़ज़ल पर अपनी बारीक़-नज़र से टिप्पणी करने के लिए आपका आभार आदरणीय तिलकराज जी। आपका सुझाव उत्तम और बेहतर है। उसके लिए भी धन्यवाद 

एक प्रश्न है: इस बह्र में प्रारम्भिक 2122 को 1122 पर लेने की छूट बताई जाती है। उसी के अनुसार 'सुना' को लिया था। जैसे हम कोई, नहीं, किसी जैसे शब्दों को ले लेते हैं। कृपया मार्गदर्शन करें।

धन्यवाद 

आ. भाई अजय जी, प्रदत्त मिसरे पर गजल का प्रयास अच्छा हुआ है। हार्दिक बधाई।

शह्र में झूठ का कुछ ऐसा असर है साईं

अब तलक सच की नहीं ख़ैर ख़बर है साईं

याद है या कोई रूहानी असर है साईं

काम करता ही नहीं कुछ भी हुनर है साईं

भूल जाता हूँ ये अक्सर कि उसे भूलना है

अब किसी बात का भी होश किधर है साईं

उसकी यादों का मैं ये बोझ उठाऊं कैसे

जैसे तैसे हो रही अपनी गुज़र है साईं

हूँ ख़ुदा होने न होने की बहस में शामिल

जेह्न वालों की जिहालत का असर है साईं

ढूंढ़ ही लेता तरक़्क़ी ये सदा जुमले में

वाह क्या आपकी भी तेज़ नज़र है साईं

एक दिन टूट ही जायेगा सफ़र में ये दम

"अस्ल जंजीर तो सामान ए सफ़र है साईं "

मौलिक एवं अप्रकाशित 

भूल जाता हूँ ये अक्सर कि उसे भूलना है
अब किसी बात का भी होश किधर है साईं।
इस पर एक उदाहरण देखें
भूल जाउँगा उसे, खुद से कहा करता हूँ
पर ये कर पाउँ मुझे होश किधर है साईं

उसकी यादों का मैं ये बोझ उठाऊं कैसे
जैसे तैसे हो रही अपनी गुज़र है साईं
उपरी तौर पर बह्र में दिखते हुए भी गेयता में अवरोध है इसमें। एक उदाहरण देखें
वज़्न यादों का तिरी कैसे उठाउँ ये बता
बात है और किसी तौर गुजर है साईं ।

ढूंढ़ ही लेता तरक़्क़ी ये सदा जुमले में
वाह क्या आपकी भी तेज़ नज़र है साईं
दोनों पंक्तियों में व्यक्ति अलग दिख रहे हैं। एक उदाहरण देखें
ढूँढ लेता है तरक्की के नये जुमले वो
बस इसी काम में कुछ तेज नज़र है साईं।

 

आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। गजल का प्रयास अच्छा हुआ है। आ. भाई तिलक राज जी के सुझाव से यह और निखर गयी है हार्दिक बधाई।

आपने खत लिखा उसका ही असर है साईं
छोड़ दी अब बुरी संगत की डगर है साईं

धर्म के नाम बताया गया भाई चारा
पर भरा अब दिलों में खूब ज़हर है साईं

देश हित जान दी जिसने वो हमारा हीरो
नाम उसका ही ज़माने में अमर है साईं

आप कहते है सभी में वो समाया फिर क्यों
द्वेष का दरिया हुआ दिल औ जिगर है साईं

खून की प्यास बुझेगी न कभी ‘मेठानी’
धर्म मजहब का नशा एक शिखर है साईं

गिरह
राख तन होगा मगर मोह मिटे ना जग से
“अस्ल जंजीर तो सामान-ए-सफ़र है साईं”
— दयाराम मेठानी
(मौलिक एवं अप्रकाशित)

आ. भाई दयाराम जी, सादर अभिवादन। गजल का प्रयास अच्छा हुआ है। कुछ मिसरे और समय चाहते है। इस प्रयास के लिए हार्दिक बधाई। 

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