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आदरणीय साहित्य प्रेमियो,

जैसाकि आप सभी को ज्ञात ही है, महा-उत्सव आयोजन दरअसल रचनाकारों, विशेषकर नव-हस्ताक्षरों, के लिए अपनी कलम की धार को और भी तीक्ष्ण करने का अवसर प्रदान करता है. इसी क्रम में प्रस्तुत है :

"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-141

विषय - "खेल तमाशा"

आयोजन अवधि- 16 जुलाई 2022, दिन शनिवार से 17 जुलाई 2022, दिन रविवार की समाप्ति तक अर्थात कुल दो दिन.

ध्यान रहे : बात बेशक छोटी हो लेकिन ’घाव करे गंभीर’ करने वाली हो तो पद्य- समारोह का आनन्द बहुगुणा हो जाए. आयोजन के लिए दिये विषय को केन्द्रित करते हुए आप सभी अपनी मौलिक एवं अप्रकाशित रचना पद्य-साहित्य की किसी भी विधा में स्वयं द्वारा लाइव पोस्ट कर सकते हैं. साथ ही अन्य साथियों की रचना पर लाइव टिप्पणी भी कर सकते हैं.

उदाहरण स्वरुप पद्य-साहित्य की कुछ विधाओं का नाम सूचीबद्ध किये जा रहे हैं --

तुकांत कविता, अतुकांत आधुनिक कविता, हास्य कविता, गीत-नवगीत, ग़ज़ल, नज़्म, हाइकू, सॉनेट, व्यंग्य काव्य, मुक्तक, शास्त्रीय-छंद जैसे दोहा, चौपाई, कुंडलिया, कवित्त, सवैया, हरिगीतिका आदि.

अति आवश्यक सूचना :-

रचनाओं की संख्या पर कोई बन्धन नहीं है. किन्तु, एक से अधिक रचनाएँ प्रस्तुत करनी हों तो पद्य-साहित्य की अलग अलग विधाओं अथवा अलग अलग छंदों में रचनाएँ प्रस्तुत हों.
रचना केवल स्वयं के प्रोफाइल से ही पोस्ट करें, अन्य सदस्य की रचना किसी और सदस्य द्वारा पोस्ट नहीं की जाएगी.
रचनाकारों से निवेदन है कि अपनी रचना अच्छी तरह से देवनागरी के फॉण्ट में टाइप कर लेफ्ट एलाइन, काले रंग एवं नॉन बोल्ड टेक्स्ट में ही पोस्ट करें.
रचना पोस्ट करते समय कोई भूमिका न लिखें, सीधे अपनी रचना पोस्ट करें, अंत में अपना नाम, पता, फोन नंबर, दिनांक अथवा किसी भी प्रकार के सिम्बल आदि भी न लगाएं.
प्रविष्टि के अंत में मंच के नियमानुसार केवल "मौलिक व अप्रकाशित" लिखें.
नियमों के विरुद्ध, विषय से भटकी हुई तथा अस्तरीय प्रस्तुति को बिना कोई कारण बताये तथा बिना कोई पूर्व सूचना दिए हटाया जा सकता है. यह अधिकार प्रबंधन-समिति के सदस्यों के पास सुरक्षित रहेगा, जिस पर कोई बहस नहीं की जाएगी.
सदस्यगण बार-बार संशोधन हेतु अनुरोध न करें, बल्कि उनकी रचनाओं पर प्राप्त सुझावों को भली-भाँति अध्ययन कर संकलन आने के बाद संशोधन हेतु अनुरोध करें. सदस्यगण ध्यान रखें कि रचनाओं में किन्हीं दोषों या गलतियों पर सुझावों के अनुसार संशोधन कराने को किसी सुविधा की तरह लें, न कि किसी अधिकार की तरह.

आयोजनों के वातावरण को टिप्पणियों के माध्यम से समरस बनाये रखना उचित है. लेकिन बातचीत में असंयमित तथ्य न आ पायें इसके प्रति टिप्पणीकारों से सकारात्मकता तथा संवेदनशीलता अपेक्षित है.

इस तथ्य पर ध्यान रहे कि स्माइली आदि का असंयमित अथवा अव्यावहारिक प्रयोग तथा बिना अर्थ के पोस्ट आयोजन के स्तर को हल्का करते हैं.

रचनाओं पर टिप्पणियाँ यथासंभव देवनागरी फाण्ट में ही करें. अनावश्यक रूप से स्माइली अथवा रोमन फाण्ट का उपयोग न करें. रोमन फाण्ट में टिप्पणियाँ करना, एक ऐसा रास्ता है जो अन्य कोई उपाय न रहने पर ही अपनाया जाय.

फिलहाल Reply Box बंद रहेगा जो - 16 जुलाई 2022, दिन शनिवार लगते ही खोल दिया जायेगा।

यदि आप किसी कारणवश अभी तक ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार से नहीं जुड़ सके है तो www.openbooksonline.com पर जाकर प्रथम बार sign up कर लें.

महा-उत्सव के सम्बन्ध मे किसी तरह की जानकारी हेतु नीचे दिये लिंक पर पूछताछ की जा सकती है ...
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मंच संचालक
ई. गणेश जी बाग़ी 
(संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक)
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स्वागतम....

 "खेल तमाशा"

मत समझो खेल तमाशा, है महंगाई की मार,
घर का खर्च चलाने में, हम हो गये है लाचार।

गीत गाये प्यार के पर, बढ़ गया है द्वेष भारी,
हर गली कस्बे में बहुत, होने लगी हेै तकरार।

मीठी बोली भूल गये, कैसे बढे़ अब सद्भाव,
भाई भाई हुआ जुदा, बट गया सारा परिवार।

धन कमाया तो खूब पर, सारा मिला अब धूल में,
प्यार के रिश्ते निभाना, अब हुआ यारों दुश्वार।

‘मेठानी’ ने कोशिश की, बहुत एकता बनी रहे,
पर सब ने मिल कर गाई, अलग होने की मल्हार।
- दयाराम मेठानी
(मौलिक एवं अप्रकाशित)

आ. भाई दयाराम जी, सादर अभिवादन। प्रदत्त विषय पर रचना का प्रयास अच्छा हुआ है। पर विधा का उल्लेख न होने से आँकलन कर पाना सम्भव नहीं। फिलहाल इस प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई।

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, प्रोत्साहन के लिए हार्दिक धन्यवाद।

तीन कुडण्लियाँ

खेेल तमाशा बन गया, मज़हब का संसार ।
जिसकी चाहो भेंट लो, घर का है व्यापार ।।
घर का है व्यापार, बने चिश्ती या खादिम ।
बाप बना हथियार, बनाकर बेटा आलिम ।।
हत्या धर्म के काज, बताओ तुमको भाया ?
कि दरगाह बदनाम, हुआ जो खेल तमाशा ।।

जन हित नृप का धर्म है, , जनहित ही विश्वास ।
प्रजातंत्र जन समर्पित, सबकी.. उसमें ..आस ।।
सबकी उसमें आस, ,. चाह ..राजा हो.. जनसेवा।
सम्प्रति बिगड़ा कार, चाहता नृप.. खुद.. मेवा ।।
कह चेतन कविराय, त्याग हो जनगण मन हित ।
सध सके राज- धर्म, कर्तव्य नृप बस जन-हित ।।

जन-जन को बाँटो स्वहित., जाति ...धर्म आधार।
राज - धर्म ..अब. बन गया, राजा का अधिकार ।।
राजा ..का ..अधिकार, स्वार्थ सिद्धि.. हई शासन ।
हेतु ...मात्र ...परिवार, बना हित साधन आसन ।।
कह चेतन कविराय, कि ...हाहाकार ..मचा.. मन ।
खेल ..तमाशा ...आज, हुआ है सुन मन जन-जन।।

मौलिक व अप्रकाशित

प्रोफ. चेतन प्रकाश 'चेतन'

आदरणीय चेतन प्रकाश जी, प्रदत्त विषयानुसार सुंदर कुण्डिलयां सृजन के लिए बधाई।

आ. भाई चेतन जी, सादर अभिवादन। प्रदत्त विषय पर सुन्दर कुन्डलियाँ हुई हैं हार्दिक बधाई।

गजल
२२२२/२२२२/२२२
*
कुछ कहते थे बचपन खेल तमाशा है
कुछ कहते थे  यौवन  खेल तमाशा है।।
*
तकनीकी ने सब कुछ छीना अब देखो
बोलो तो किस आँगन खेल तमाशा है।।
*
पलपल निर्धन को दुष्कर हर वक्त रहा
और धनी को  जीवन  खेल तमाशा है।।
*
संकोची सोचा  करता है दुनिया की
उन्मुक्ती को  बन्धन  खेल तमाशा है।।
*
होती होगा जिम्मेदारी किसी दौर में
जनसेवा तज शासन खेल तमाशा है।।
*
मौलिक/अप्रकाशित

आदाब,  भाई लक्ष्मण सिंह धामी मुसाफिर,  उन्मुक्त संज्ञा और विशेषण दोनों ही स्वरूपों  मे स्वीकार्य है, परन्तु  'उन्मुक्ती  कदाचित  अशुद्ध प्रयोग है ! साथ  ही बह्र भी टूटती है । पाँचवा  शे'र भी देखिएगा ।

आ. भाई चेतन जी, सादर अभिवादन। रचना पर उपस्थिति, और मार्गदर्शन के लिए आभार।

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, प्रदत्त विषय पर सुंदर सृजन के लिए बधाई।

आ. भाई दयाराम जी, सादर अभिवादन। रचना पर उपस्थिति व प्रशंसा के लिए आभार।

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आवश्यक सूचना:-

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