सुलगन :
तुम
अपना तमाम धुआँ
मुझे सौंप
चले गए
मुझे अकेला छोड़
मेरी देह
तुम्हारे धुएँ की गर्मी से
देर तक
ऐसे सुलगती रही
जैसे
गरम सिगरेट की
झड़ी हुई राख से
सुलगती है
कोई
ऐश -ट्रे
देर तक
सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित
Comment
आदरणीय डॉ छोटेलाल जी सृजन के भावों की आत्मीय सराहना का दिल से शुक्रिया।
आदरणीय समर कबीर साहिब , आदाब .... सर आपकी स्नेहाशीष से सृजन सार्थक हुआ। हार्दिक आभार।
आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह जी सृजन आपकी मधुर प्रशंसा का आभारी है।
आदरणीय शेख़ उस्मानी साहिब, आदाब ... सृजन के भावों को मान देने का दिल से शुक्रिया।
जनाब सुशील सरना जी आदाब,बहुत उम्दा कविता हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
आद0 सुशील सरना जी सादर अभिवादन। बढिया सृजन पर मेरी बधाई स्वीकार कीजिये।
बेहतरीन सांकेतिक संदेश वाहक रचना के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत मुबारकबाद मुहतरम जनाब सुशील सरना साहिब।
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