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जन भ्रमित है , मन भ्रमित है -- डॉ o विजय शंकर

जन भ्रमित है ,
मन भ्रमित है ,
जन-इच्छा , बनी नहीं ,
जन-शक्ति , जगी नहीं ,
जनतंत्र है , तंत्र को
जन की ही खबर नहीं ,
कोई फ़िकर नहीं |
तंत्र जन जन से दूर है ,
जन तंत्र से मजबूर है ,
विवश है, लाचार है,
डरा ,सहमा , बीमार है,
कुछ कह नहीं पाता ,
जनादेश देने वाला,
आदेश , किसी को ,
दे नहीं पाता ,
तंत्र व्यस्त है , स्वयं में मस्त है ,
जन उपेक्षित है , हालात से त्रस्त है ,
तंत्र क्या क्या पा रहा है,
जन क्या क्या खो रहा है ,
दोनों को पता नहीं ,
वो हँस रहा है, वो रो रहा है,
सेवक अलमस्त सो रहा है,
मालिक छुप के रो रहा है||
ये कर है, वो कर है ,
हर सेवा पर कर है ,
करों की भरमार है ,
सुविधा-शुल्क की मार है ,
जन-सुविधा जनाचार है ,
है ,कहीं भी है , तो क्यों ,
क्यों, ये अनाचार है।

ये कौन गुनगुना रहा है ,
कौन नांच - गा रहा है ,
दूर कौन बँसुरी बजा रहा है ,
ये धुंआ कहाँ , कहाँ से आ रहा है ,
उसकी नज़र में क्या है , जो
उसे ही ये नज़र नहीं आ रहा है।
उसे ये नज़र क्यों नहीं आ रहा है।

मौलिक एवं अप्रकाशित
डॉo विजय शंकर

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 20, 2015 at 6:54pm
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति आदरणीय डॉ शंकर सर।
Comment by Hari Prakash Dubey on January 20, 2015 at 6:27pm

आदरणीय डॉ विजय शंकर सर सुन्दर अभिव्यक्ति ......तंत्र क्या क्या पा रहा है,...जन क्या क्या खो रहा है ,
दोनों को पता नहीं ,...."इस कथन पर ध्यान अटक गया ".बहुत खूब ,हार्दिक बधाई ! सादर 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 20, 2015 at 3:21pm

सच्ची सच्ची बात, सीधी सीधी बात, नो बकवास, 

सुन्दर और सटीक अभिव्यक्ति हेतु बहुत बहुत बधाई आदरणीय डॉ विजय शंकर जी.

कृपया ध्यान दे...

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