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तीन कुंडलियां / अविनाश बागडे

(१)
शक्तिशाली खूब बनो,साहस हो भरपूर.
विनम्रता के भाव ही,मन में रहे प्रचूर.
मन में रहे प्रचूर ,सादगी का गहना हो.
अपनी जरुरत की सरहद में ही रहना हो.
कहता है अविनाश,बढ़ेगी तब खुशहाली.
जीवन अपना और बनेगा शक्तिशाली.
(२)
भाई से भाई टकरा के होते है बरबाद.
दुश्मन के सारे मंसूबे हो जाते आबाद.
हो जाते आबाद,सभी तुम पर हंसते है.
टूटा घर दिखलाकर सब फिकरे कसते हैं.
कहता है अविनाश रोकिये जगत हंसाई
घर का झगडा घर में ही निपटाओ भाई.
(३)
मौसम करवट बदल रहा ,भली लग रही धूप.
परिवर्तन है परिधानों में ,मौसम के अनुरूप.
मौसम के अनुरूप, मनोहर कपड़े आये.
मफलर,स्वेटर,शाल बदन पर रंग जमाये.
कहता है अविनाश,मानिये बात ये हरदम.
साथ समय के बदलो,जैसा बदले मौसम.
अविनाश बागडे.

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Comment by Saurabh Pandey on February 7, 2012 at 11:22pm

कुण्डलिया = दोहा, रोला, रोला ...

अब जरा अपनी कुण्डलिया को परखें भाई जी.  मैं भी दिलबाग़जी की बातों को स्वीकारता हूँ.

Comment by राज लाली बटाला on February 7, 2012 at 10:14pm

अविनाश बागडे जी
तीन कुंडलियां खूब र्ही जी!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 6, 2012 at 12:39pm

bahut shaandar, sashakt, prernadaai kundliyan.......vaah

Comment by AVINASH S BAGDE on February 6, 2012 at 10:56am

aabhar aadarniy Dilbag ji...Raj bundeli ji.

Comment by dilbag virk on February 5, 2012 at 4:16pm

सुंदर कहन

शिल्प पक्ष में कुछ गडबड दिख रही है , सुधीजनों के मत का इंतजार है , तभी शंकाओं का समाधान होगा

Comment by कवि - राज बुन्दॆली on February 5, 2012 at 1:28pm

वाह,,,,,,,,,,,पूरी तरह से परिभाषित कुण्डली,,,,,,,,काबिलॆ-तारीफ़ हैं तीनॊं कुण्डली,,,,,,

बधाई स्वीकार करियॆ,,,,,,,,,,,,,,,,

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