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ग़ज़ल -जो तुम खामोशियाँ पढ़ लो नियामत और हो जाए

1222 1222 1222 1222
****
निगाहों से बुला लीजे शरारत और हो जाए ।
जो धड़कन में बसा लीजे इनायत और हो जाए।।

.

कलाई की अदा देखी कई पैगाम  देती है ।
जरा कंगन बजा दीजे कयामत और हो जाए।।

.

ये परवानों की महफ़िल है गिरा दीजे ज़रा चिलमन।

कहीं ऐसा न हो हमदम अदावत और हो जाए।।

.

दिलों को चैन हम देंगे जफ़ा से तौबा करने दो।
वफ़ा की राह में चाहे बगावत और हो जाए।।

.

मेरे ख़त में तड़पती है जमाल-ए-दीद की हसरत ।

जो तुम खामोशियाँ पढ़ लो तो नैमत और हो जाए ।।

निगाहें कर रही घायल लटों की ओट से तौबा।
जरा अलकें हटा लीजे इनायत और हो जाए ।।

.

"मौलिक व अप्रकाशित" 

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Comment

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Comment by अलका 'कृष्णांशी' on December 27, 2016 at 9:03pm

आदरणीय आशीष यादव जी ,आपको प्रयास पसन्द आया इसके लिए धन्यवाद। सादर

Comment by अलका 'कृष्णांशी' on December 27, 2016 at 9:02pm

आदरणीय डॉ गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी , आपको प्रयास पसन्द आया इसके लिए धन्यवाद।

मैं अलका हूँ,अपने दोनों परिवारों और उनसे मिले सरनेम का आदर करती हूँ। मुझे मेरी पहचान मेरे हस्बैंड ललित जी के साथ पसन्द आती है इसलिए अलका ललित।
आ० मिथिलेश जी और आ० समर कबीर जी की आभारी हूँ ,उनकी सलाह अनुसार संशोधन किया है। सादर

Comment by अलका 'कृष्णांशी' on December 27, 2016 at 9:00pm

आदरणीय समर कबीर जी,शुभकामनाओं के लिए बहुत आभार आपका । प्रयास पर आपके मश्वरे के लिए भी तहेदिल से शुक्रिया।

उर्दू शब्द गूगल से ही ढूंढती हूँ इसलिए ज्यादा नहीं जानती।
आपके सुझाव अनुसार संशोधन किया है । सादर

Comment by Samar kabeer on December 25, 2016 at 9:15pm
मोहतरमा अलका ललित जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ।
बह्र तो आपने ख़ूब निभाई है,लेकिन चौथा शैर व्याकरण की वजह से मुह्मिल हो गया है:-
'दिलों को चैन हम देंगे जफ़ा से कर लिया तौबा'"तौबा"शब्द स्त्रीलिंग है, इसलिये मिसरा बेकार हो रहा हैं,आप चाहें तो इसे इस तरह किया जा सकता है:-
"दिलों को चैन हम देंगे जफ़ा से तौबा करने दो"।
पांचवें शैर का ऊला मिसरा भी गलत हो रहा है,दिखिये:-
'मेरे ख़त में तड़पती है मजाल-ए-दीद की हसरत'इस मिसरे में'मजाल-ए-दीद'अर्थ हीन है, आप शायद यूँ कहना चाहती हैं:-
"मेरे ख़त में तड़पती है जमाल-ए-दीद की हसरत"
इसी शैर के सानी मिसरे में क़ाफ़िया दोष है,'नियामत'उर्दू में कोई। शब्द ही नहीं है सही शब्द है "नैमत"आपका शैर यूँ कहना होगा :-
"मेरे ख़त में तड़पती है जमाल-ए-दीद की हसरत
जो तुम ख़ामोशियां पढ़ लो तो नैमत और हो जाए"
बाक़ी शुभ शुभ,प्रयासरत रहें,शुभकामनायें ।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 25, 2016 at 8:56pm

आ० यह गजल अलका जी का है या ललित जी का या फिर दोनों का सम्मिलित प्रयास है , जो भी हो बढ़िया कोशिश है . आ० मिथिलेश जी की सलाह पर अम्ल जरूर करें .

Comment by अलका 'कृष्णांशी' on December 24, 2016 at 5:41pm

आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी बहुत बहुत धन्यवाद।आपने समय दे कर बहुत ही अच्छे से detail में समझाया है बहुत शुक्रिया आपका। आपके मूल्यवान मश्वरे के लिए भी तहेदिल से शुक्रिया।
आपके सुझाव अनुसार संशोधन किया है । सादर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 24, 2016 at 2:23am

आ. अलका ललित जी, आपकी किसी पहली प्रस्तुति से गुजर रहा हूँ. ओबीओ परिवार में हार्दिक स्वागत है. बहुत बढ़िया ग़ज़ल कही है. शेर दर शेर दाद ओ मुबारकबाद कुबूल फरमाएं. 

मतला बहुत बढ़िया हुआ है लेकिन यह भी अवश्य है कि मिसरा-ए-उला में लीजे का प्रयोग और मिसरा-ए-सानी में लो तो का प्रयोग अटपटा लग रहा है. या तो दोनों मिसरों में लीजे हो या लो तो 

कलाई की अदा देखि कई पैगाम है देती ।-------> कलाई की अदा देखी कई पैगाम  देती  है।

दिलों को दर् /द न देंगे /जफ़ा से कर /लिया तौबा ।------------> यह मिसरा बेबहर हो रहा है . न और ना दोनों वजन 1 मात्रा ही होता है.

1222        /1122  /  1222       / 1222

मजाले-ए-दीद को  मजाल-ए-दीद कर लीजियेगा 

इस शानदार ग़ज़ल पर दिल से दाद कुबूल फरमाएं. सादर 

Comment by आशीष यादव on December 23, 2016 at 1:06am
Bahut khoob.
Hasin ghazal

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