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नियति का आशीर्वाद

नियति का आशीर्वाद

हमारे बीच

यह चुप्पी की हलकी-सी दूरी

जानती हो इक दिन यह हलकी न रहेगी

परत पर परत यह ठोस बनी

धातु बन जाएगी

तो क्या नाम देंगे हम उस धातु को ?

बहुत देर न हो जाएगी तब तक  ?

रात के संग सिसकारी भरती

तुम रात-अँधेरे देर तक, प्रिय

कुहनी टेके उदास न हो, बेचैन न रहो

मन में महकता आत्म-विश्वास रखो

याद रहे कि नियति की स्नेह-दृष्टि इक दिन

आसमानी फ़ासलों से उतर कर

अवश्य देगी आशीर्वाद तुमको

मौन थे जो मिट्टी के ढेले-से

अरमान किसी गुमनाम गड्ढे में

अब तक थे पड़े कहीं अतल में

सुनो नियति की है यह भविष्यवाणी 

प्रेरणा से ध्वनित नि:संदेह खुलेंगे

सौन्दर्यमय मनोहर

हृदय-व्योम में रत्न-विवर तुम्हारे

स्पष्ट होंगे तब अचानक

भूले बिसरे कितने कल्पना-स्वप्न

तिमिर कगारों पर होंगी

लहराती उजली रेखाएँ

भविष्य-धारा में सम्भावनाएँ

और उद्घाटित होंगे 

ज़िन्दगी जीने के दिशा-नयन नए

जानती हो ?

तुम्हारी आँखों को हँसते देख उस समय

कितना सुविकसित होगा मुसकाता मन मेरा

              ----------

-- विजय निकोर

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by vijay nikore on February 8, 2020 at 5:08pm

सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, भाई समर कबीर जी

Comment by Samar kabeer on January 30, 2020 at 5:35pm

प्रिय भाई विजय निकोर जी आदाब,बहुत अच्छी कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by vijay nikore on January 29, 2020 at 1:53pm

सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, मित्र लक्ष्मण जी

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 28, 2020 at 7:00am

आ. भाई विजय निकोर जी, सादर अभिवादन। उत्तम रचना हुई है , हार्दिक बधाई ।

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