For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

2×15

एक ताज़ा ग़ज़ल

वो कहते हैं चाहत कब थी वो इक झूठा सपना था
मुझको भी वो भूलना होगा जो कुछ मैंने सोचा था

इससे बेहतर खुद को समझाने की बात नहीं कोई
जो कुछ किस्मत में लिक्खा था वो तो आखिर होना था

कुछ सालों से मैंने खुद को हँसते हुए नहीं देखा
कुछ सालों मैंने तेरी झूठी मुस्कान को देखा था

सोच समझ वाले लोगों की कुछ भी समझ नहीं आया
जाने कौन सा योग था जो मेरी कुंडली में बैठा था

तरकीबें नाकाम रही सब दुख से तुझे बचाने की
दुनिया की हर राह पता थी दर-दर सर भी पटका था

बंद गली के सन्नाटे में जैसे कदमों की आहट
मेरे मन में तेरा आना शायद कुछ कुछ ऐसा था

मेरे मालिक मिला है क्या क्या इतना तो बतला जाते
मेरे टूटे दिल को तुमने सौ हाथों से लूटा था

बाहर गहरा सन्नाटा है अंदर हलचल का मौसम
वो लिखना मुमकिन ही नहीं था जो कुछ मैंने सोचा था

वीर बताने वालों खुद को क्या इसका अहसास नहीं
जिसको तुमने मिटा दिया है वो भी किसी का बेटा था

अपने अपने सच की रक्षा करने वालों याद रहे
इस मिट्टी का एक ही सच था हर सच से जो सच्चा था

आज शिकायत लाख तुझे पर आखिर यही हकीकत है
अपनी आंखों से तुमने 'अहसास' का सपना देखा था

मौलिक और अप्रकाशित 

Views: 157

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Manoj kumar Ahsaas on October 4, 2019 at 4:48pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय समर कबीर साहब

आपकी बहुमूल्य इस्लाह के बिना ग़ज़ल अधूरी रह जाती है

आशीर्वाद बनाये रखिये

सादर

Comment by Samar kabeer on September 29, 2019 at 11:17am

जनाब मनोज कुमार अहसास जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें ।

'आज शिकायत लाख तुझे पर आखिर यही हकीकत है
अपनी आंखों से तुमने 'अहसास' का सपना देखा था'

इस शैर में शुतरगुरबा का दोष देखें ।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

Manan Kumar singh commented on Manan Kumar singh's blog post गजल(मूंदकर आंखें.....)
"आपका हार्दिक आभार,आदरणीय लक्ष्मण भाई।"
55 minutes ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post
6 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Manan Kumar singh's blog post गजल(मूंदकर आंखें.....)
"आ. भाई मनन कुमार जी, सादर अभिवादन । बहुत खूबसूरत गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।"
8 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल-चाँद के चर्चे आसमानों में
"आ. भाई बृजेश कुमार जी, सुन्दर गजल हुई है । हार्दिक बधाई स्वीकारें ।"
8 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post अछूतों सा - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)
"आ. भाई  बृजेश जी सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और सुझाव के लिए आभार ।"
8 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post महज चाहत का रिस्ता है - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'( गजल)
"आ. भाई सुरेंद्र जी, सादर अभिवादन । गजलपर उपस्थिति व समालोचना के लिए आभार । आपके कथनानुसार गजल पर…"
9 hours ago
आशीष यादव commented on आशीष यादव's blog post पानी गिर रहा है
"आदरणीय श्री  बृजेश कुमार 'ब्रज' जी रचना पर मूल्यवान टिप्पणी के लिए बहुत…"
16 hours ago
सालिक गणवीर commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( जाना है एक दिन न मगर फिक्र कर अभी...)
"भाई ब्रजेश कुमार जी सादर अभिवादन ग़ज़ल पर आपकी हाजिरी और सराहना के लिए हृदयतल से आभार."
21 hours ago
बृजेश कुमार 'ब्रज' posted a blog post

ग़ज़ल-चाँद के चर्चे आसमानों में

लंबे अंतराल के बाद एक ग़ज़ल के साथ 2122 1212 22चाँद के चर्चे आसमानों में और मेरे सभी फसानों मेंअय हवा…See More
21 hours ago
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( जाना है एक दिन न मगर फिक्र कर अभी...)
"बड़ी ही खूबसूरत ग़ज़ल कही है आदरणीय सालिक जी...आदरणीय समर जी एवं रवि जी की विवेचना भी शानदार रही.."
21 hours ago
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post अछूतों सा - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)
"आदरणीय धामी जी बहुत बढ़िया ग़ज़ल कही है परंतु मतले का उला खटक रहा है... "वगरना वक़्त दे देगा…"
22 hours ago
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post सितारों के बिना ये आसमाँ अच्छा नहीं लगता
"बहुत ही भावपूर्ण ग़ज़ल कही है मित्र...बधाई मेरा दम शहर में घुटता है कुछ दुख गाँव में भी हैं यहाँ…"
22 hours ago

© 2020   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service