For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

मखमली से फूल नाज़ुक पत्तियों को रख दिया

शाम होते ही दरीचे पर दियों को रख दिया

 

लौट के आया तो टूटी चूड़ियों को रख दिया

वक़्त ने कुछ अनकही मजबूरियों को रख दिया

 

आंसुओं से तर-बतर तकिये रहे चुप देर तक  

सलवटों ने चीखती खामोशियों को रख दिया

 

छोड़ना था गाँव जब रोज़ी कमाने के लिए

माँ ने बचपन में सुनाई लोरियों को रख दिया 

 

भीड़ में लोगों की दिन भर हँस के बतियाती रही 

रास्ते पर कब न जाने सिसकियों को रख दिया

 

इश्क के पैगाम के बदले तो कुछ भेजा नहीं

पर मेरी खिड़की पे उसने तितलियों को रख दिया

 

नाम जब आया मेरा तो फेर लीं नज़रें मगर

भीगती गजलों में मेरी शोखियों को रख दिया

 

चिलचिलाती धूप में तपने लगी जब छत मेरी

उनके हाथों की लिखी कुछ चिट्ठियों को रख दिया 

 

कुछ दिनों को काम से बाहर गया था शह्र के

पूड़ियों के साथ उसने हिचकियों को रख दिया

 

कुछ ज़ियादा कह दिया, वो चुप रही पर लंच में

साथ में सौरी के मेरी गलतियों को रख दिया

 

बीच ही दंगों के लौटी ज़िन्दगी ढर्रे पे फिर

शह्र में जो फौज की कुछ टुकड़ियों को रख दिया

 

कुछ दलों ने राजनीती की दुकानों के लिए

वोट की शतरंज पे फिर फौजियों को रख दिया

 

मौलिक व् अप्रकाशित 

Views: 1251

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Ajay Tiwari on July 20, 2019 at 10:39am

आदरणीय दिगंबर जी, बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है. हार्दिक बधाई.

Comment by Balram Dhakar on February 11, 2019 at 11:06pm

आदरणीय दिगम्बर जी, बहुत ख़ूबसूरत अशआर हुए हैं। शेर दर शेर दाद के साथ मुबारक़बाद क़ुबूल फ़रमाएं।

सादर।

Comment by Samar kabeer on January 27, 2019 at 2:21pm

मेरे कहे को मान देने के लिए धन्यवाद, आप चाहें तो यहाँ भी एडिट कर सकते हैं ।

Comment by दिगंबर नासवा on January 27, 2019 at 12:25pm

महेंद्र जी आपका आभार है ... मैं भी अभी विद्यार्थी ही हूँ इस ग़ज़ल गंगा में ... 

आपको शेर पसंद आया तो लिखना सार्थक हुआ ...

Comment by दिगंबर नासवा on January 27, 2019 at 12:23pm

आदरणीय समर कबीर साहब ... आपका बताया मिसरा बहुत ही सुन्दर है ... मूल ग़ज़ल में बदलाव करना ठीक रहेगा .. आपका आभार ... 

कह दिया ज्यादा ... आपका कहना सही है कई बार सही शब्द से ज्यादा प्रचलित शब्द के पीछे गलतियाँ हो जाती हैं ... आपका आभार नए मिसरे के लिए ... 

Comment by Mahendra Kumar on January 27, 2019 at 11:24am

कुछ दलों ने राजनीती की दुकानों के लिए

वोट की शतरंज पे फिर फौजियों को रख दिया ...सामयिक शेर!

इस बढ़िया ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए आदरणीय दिगंबर नासवा जी. यदि आप ग़ज़ल के अरकान भी लिखे देते हम जैसे नये सीखने वालों के लिए बेहतर रहता. सादर.

Comment by Samar kabeer on January 27, 2019 at 10:51am

'शाम होते ही चोबारे पर दियों को रख दिया'

मेरे नज़दीक 'चौबारे' को "चुबारे" करना उचित नहीं,इस मिसरे को चाहें तो यूँ कर सकते हैं:-

'शाम होते ही दरीचे पर दियों को रख दिया'

'कह दिया ज्यादा, रही चुप वो, मगर फिर लंच में'

इस मिसरे में सहीह शब्द "ज़ियादा" इसलिए मात्रा पतन मुमकिन नहीं,इस मिसरे को यूँ कर सकते हैं:-

'कुछ ज़ियादा कह दिया,वो चुप रही पर लंच में'

 

Comment by दिगंबर नासवा on January 26, 2019 at 11:04pm

इस ग़ज़ल का कुछ बातों पर मैं अपनी राय रखना चाहूंगा चौबारा का जिस जगह इस्तेमाल हुआ है वहां मुझे लग रहा है कि रुक्न के हिसाब से लफ्ज़ का इस्तेमाल नही हुआ है कृपया स्पष्ट कीजिए गा। इसी तरह ज्यादा शब्द 122 के वश में है इसका प्रयोग 22 के वश में हुआ है इसे भी देखियेगा।

आदरणीय रवि जी ... मैं अधिकतर ध्वनि को ही मूल रख कर लफ़्ज़ों का प्रयोग करता हूँ अतः इस बात पर उस्तादों की राय ज्यादा महत्वपूर्ण होगी ... आदरणीय समर कबीर इस विषय पे कुछ बताएँगे तो मुझे भी जानकारी हो जायेगी ...

आपका त्वरित सुझाव बहुत अच्छा है ... आपकी पंक्तियाँ सहज लग रही हैं ... 

आपको शेर अच्छे लगे ... ये मेरा सौभाग्य है ... आपका आभार बहुत बहुत ...

Comment by Ravi Shukla on January 26, 2019 at 9:52pm

आदरणीय दिगंबर साहब बहुत अच्छी गजल आपने कहीं कई नए बिम्ब आप लेकर आए बहुत-बहुत स्वागत है इस ग़ज़ल का कुछ बातों पर मैं अपनी राय रखना चाहूंगा चौबारा का जिस जगह इस्तेमाल हुआ है वहां मुझे लग रहा है कि रुक्न के हिसाब से लफ्ज़ का इस्तेमाल नही हुआ है कृपया स्पष्ट कीजिए गा। इसी तरह ज्यादा शब्द 122 के वश में है इसका प्रयोग 22 के वश में हुआ है इसे भी देखियेगा।

भीड़ में लोगों की दिन भर हँस के बतियाती रही 

रास्ते पर कब न जाने सिसकियों को रख दिया ।बहुत अच्छा लगा ये शेर 

एक त्वरित सझाव भी है । किंतु लेखकीय स्वतंत्रता सर्वोपरि है 

आ गई दंगों से उजड़ी जिंदगी फिर राह पर

अच्छी ग़ज़ल के लिए एक बार उन्हें दिली मुबारकबाद कुबूल कीजिए

 

Comment by दिगंबर नासवा on January 25, 2019 at 10:07am

बहुत शुक्रिया आदरणीय समीर कबीर साहब ... गलती का सुधार कर लिया है ...

उम्मीद है आपका आशिर्वाद, आपका साथ मिलता रहेगा ...  

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna posted a blog post

दोहा सप्तक. . . . घूस

दोहा सप्तक. . . . . घूस बिना कमीशन आजकल, कब होता है काम । कैसा भी हो काम अब, घूस हुई है आम ।। घास…See More
6 hours ago
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
"सादर नमस्कार। मुझे ऐसी ही एक चर्चा की अपेक्षा थी। आवश्यकता महसूस हो रही थी। हार्दिक धन्यवाद और…"
8 hours ago

सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
"ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के सभी सम्मानित सदस्यों को सादर नमस्कार। आदरणीय तिलक राज कपूर सर द्वारा…"
8 hours ago
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
"सभी आदरणीय सदस्यों को नमस्कार, एक महत्वपूर्ण चर्चा को आरम्भ करने के लिए प्रबन्धन समिति बधाई की…"
9 hours ago
Admin posted a discussion

ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा

साथियों,विगत कई माह से ओ बी ओ लाइव आयोजनों में कतिपय कारणवश सदस्यों की भागीदारी बहुत ही कम हो रही…See More
9 hours ago
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . . घूस
"आदरणीय  अखिलेश जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय जी । सहमत एवं संशोधित "
16 hours ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . . घूस
"आदरणीय सुशीलजी हार्दिक बधाई। लगातार बढ़िया दोहा सप्तक लिख रहें हैं। घूस खोरी ....... यह …"
18 hours ago
Jaihind Raipuri posted a blog post

वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं

ग़ज़ल 2122  1212  22वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैकितने दुःख दर्द से भरा दिल हैये मेरा क्यूँ हुआ है…See More
Thursday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . . घूस
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन आपकी मनोहारी प्रतिक्रिया से समृद्ध हुआ । हार्दिक आभार आदरणीय । फागोत्सव…"
Mar 4
Nilesh Shevgaonkar and Dayaram Methani are now friends
Mar 4
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212   22 वो समझते हैं मस्ख़रा दिल है कितने दुःख दर्द से भरा दिल…"
Mar 3
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . . घूस
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
Mar 3

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service