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राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ७३ एक मज़ाहिया ग़ज़ल

2122 1122 1122 22/ 122

वह्म को खोल के हमने तो वहम कर डाला
जीभ थी ऐंठती, इस दर्द को कम कर डाला

बाज़ लफ़्ज़ों के तलफ़्फ़ुज़ को हज़म कर डाला
नर्म जो थी न सदा उसको नरम कर डाला

क़ह्र की छुट्टी करी सीधे कहर को लाकर
टेढ़े अलफ़ाज़ पे हमने ये सितम कर डाला

क्योंकि लंबी थी बहुत रस्मो क़वायद पे बहस
ख़त्म होती नहीं ख़ुद, हमने ख़तम कर डाला

बंदा पंजाबी था कहने लगा सुन ऐ पुत्तर
नज़्म को खींच कर हमने तो नज़म कर डाला

अब तो हम राज़ हैं मर्दुम नहीं, बस इक दुम हैं
मर के मर्दुम से हर्फ़े 'मर' को क़लम कर डाला

~राज़ नवादवी 

"मौलिक एवं अप्रकाशित"

मर्दुम- मनुष्य, आदमी, सभ्य

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Comment by rajesh kumari on November 29, 2018 at 11:45am

अच्छी ग़ज़ल राज़ साहब मजाहिया के साथ तंज भी खूब है दिल से दाद हाज़िर है 

Comment by राज़ नवादवी on November 26, 2018 at 10:59pm

आदरणीय तेज वीर सिंह साहब , ग़ज़ल में शिरकत और हौसला अफ़ज़ाई का दिल से शुक्रिया, , सादर। 

Comment by TEJ VEER SINGH on November 26, 2018 at 8:46pm

हार्दिक बधाई आदरणीय राज़ नवादवी जी।बेहतरीन गज़ल।

क्योंकि लंबी थी बहुत रस्मो क़वायद पे बहस
ख़त्म होती नहीं ख़ुद, हमने ख़तम कर डाला

Comment by राज़ नवादवी on November 25, 2018 at 8:34pm

जनाब क़मर जौनपुरी साहब, आदाब. ग़ज़ल में आपकी शिरकत और ज़र्रा नवाज़ी का तहे दिल से शुक्रिया. सादर 

Comment by राज़ नवादवी on November 25, 2018 at 8:33pm

जनाब समर कबीर साहब, आपके रद्दे अमल और हौसला अफज़ाई का तहे दिल से शुक्रिया. सादर 

Comment by राज़ नवादवी on November 25, 2018 at 8:30pm

जनाब अनिस साहब, आपका हमेशा खैर मख्दम है. 

Comment by क़मर जौनपुरी on November 25, 2018 at 5:38pm

बहुत ख़ुशनुमा ग़ज़ल हुई है। जनाब राज़ साहब मुबारकबाद कबूल करें।

Comment by Samar kabeer on November 25, 2018 at 5:18pm

जनाब राज़ साहिब आदाब,अब क्या कहूँ जब आपने 'ख़त्म को ख़तम कर डाला',बधाई इस प्रस्तुति पर ।

Comment by Md. Anis arman on November 25, 2018 at 3:01pm

हा हा हा हा हा अच्छा जनाब मैं कुछ ज्यादा दिमाग खपा डाला था आपका बहुत बहुत शुक्रिया |

Comment by राज़ नवादवी on November 25, 2018 at 2:41pm

आदरणीय अनिस साहब, ज़र्रानवाज़ी का तहे दिल से शुक्रिया. ख़ुदा आपको इल्मो अदब की ऊँचाई तक ले जाए. ये ग़ज़ल अरूज़ और ज़ुबानी क़ायदे से जुड़ी बहस पे एक मज़ाहिया बयान है, कुछ ख़ास नहीं. मतले में ये कहा गया है कि अस्ल लफ्ज़ 'वह्म' के तलफ्फुज़ में जीभ ऐंठती है, इसलिए इसे सीधे सीधे 'वहम' बोल रहा हूँ. सादर 

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