For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

इन्वेस्टमेंट-लघुकथा

थाने के अंदर जाकर उसने एक किनारे अपनी बाइक खड़ी की और चारो तरफ का मुआयना करने लगा. काफी बड़ा अहाता था इस थाने का और एक तरफ संतरी बंदूक जमीन पर टिकाये उसी को देख रहा था. वह धीरे धीरे संतरी की तरफ बढ़ा तभी उसकी नज़र एक खम्भे से बंधे एक आदमी पर पड़ी. गंदे कपडे पहने उस पुरुष की पीठ उसकी तरफ थी और उसके पास दो पुलिस वाले खड़े थे.
इतने में इंस्पेक्टर बाहर आये और उसको देखते ही एक सिपाही को आवाज़ लगाया "अरे दो कुर्सी निकालो बाहर". उसने इंस्पेक्टर से हाथ मिलाया और दोनों कुर्सियों पर बैठ गए.
"जल्दी से दो चाय लाना" बोलकर वह उठा और उस खम्बे की तरफ बढ़ा. खम्भे में बंधा आदमी कांपने लगा, उसे लग गया कि अब उसकी शामत आने वाली है.
"इसी हरामजादे ने मोटर चुराई थी ना, जरा लाठी लाना, बहुत चर्बी चढ़ गयी है इसपर", बोलते हुए वह खम्बे के पास पहुँच गया. खम्बे में बंधा आदमी अब रोने लगा था और एक पुलिस वाले ने लाठी लाकर उसे पकड़ा दिया.
"रस्सी खोलकर इसके दोनों हाथ पकड़ो, साले को चोरी का इनाम देता हूँ", वह गुर्राया. रस्सी से बंधा आदमी अब जोर जोर से रोने लगा, उसकी रस्सी खोलकर दोनों पुलिस वालों ने उसके हाथ पकड़ लिए.
"चोप्प साला, नाटक करता है, अभी समझाता हूँ", और उसने ताबड़तोड़ लाठियां उसके पिछवाड़े पर बरसानी शुरू कर दी.
इस बीच एक पुलिसवाले ने चाय लाकर रख दी थी, वह आदमी बुरी तरह चिल्ला रहा था. कुछ ही समय बाद वह एक पुलिसवाले की तरफ झूल गया और  इंस्पेक्टर ने लाठी मारना बंद कर दिया.
"ले जाओ साले को और बंद कर दो अंदर. अगर अब भी नहीं कबूलेगा तो रात को इसका दूसरा इलाज करेंगे", कहकर वह हाथ झाड़ता हुआ आया और कुर्सी पर बैठ गया.
'लीजिये चाय पीजिये, ये सब यही भाषा समझते हैं. पिछले महीने भी एक मोटर चुराया था इस साले ने और बाद में इसके बाप ने लौटाया. अच्छा कोई बढ़िया स्कीम बताईये मैनेजर साहब जहाँ हम इन्वेस्ट करें", इंस्पेक्टर ने बड़े आराम से कहा जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो और चाय उठाकर पीने लगा.
सामने कप में रखी चाय उसे खून जैसी लग रही थी, उसे अख़बारों और पत्रिकाओं में पढ़े मानवाधिकार की बातें याद आने लगीं. फिर उसे याद नहीं रहा कि उसने इंस्पेक्टर को क्या बताया, लेकिन रात को खाना खाने के बाद उसे उल्टी हो गयी.  

मौलिक एवम अप्रकाशित

Views: 50

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by विनय कुमार on October 15, 2018 at 1:05pm

बहुत बहुत आभार आ लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 14, 2018 at 6:09pm

आ. भाई विनय कुमार जी,अच्छी लघुकथा लिखी। इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकारें ।

Comment by विनय कुमार on October 13, 2018 at 4:42pm
Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on October 13, 2018 at 10:50am

आद0 विनय जी सादर अभिवादन। मानवाधिकार की बातें पर बेहतरीन कटाक्ष करती और थानों की सच्चाई बयाँ करती इस बेहतरीन लघुकथा पर आपको हार्दिक बधाई।

Comment by विनय कुमार on October 11, 2018 at 9:55pm

बहुत बहुत आभार आ सतविंद्र कुमार राणा जी

Comment by विनय कुमार on October 11, 2018 at 9:54pm

बहुत बहुत आभार आ मुहतरम समर कबीर साहब

Comment by विनय कुमार on October 11, 2018 at 9:53pm

बहुत बहुत आभार आ डाँ विजय शंकर साहब

Comment by विनय कुमार on October 11, 2018 at 9:52pm

बहुत बहुत आभार आ शेख शहजाद उस्मानी साहब, आपने लघुकथा पर समय दिया और विस्तृत टिप्पणी की. आपका सुझाव बढ़िया है, विचार करूँगा, शुक्रिया

Comment by विनय कुमार on October 11, 2018 at 9:51pm

बहुत बहुत आभार आ आशा जुगरान जी

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on October 11, 2018 at 7:49pm

उत्तम कथा आदरणीय विनय कुमार जी। ओपन में थर्ड डिग्री का बखूबी चित्रण किया आपने। और पक्ष भी दिमाग में कौंधते हैं इसे पढ़ते हुए।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Samar kabeer commented on Pradeep Devisharan Bhatt's blog post "मन मार्जियां "
"जनाब प्रदीप भट्ट साहिब आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,लेकिन ग़ज़ल बह्र और क़वाफ़ी के हिसाब से समय चाहती…"
6 hours ago
TEJ VEER SINGH commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"हार्दिक बधाई आदरणीय नवीन मणि जी।बेहतरीन गज़ल। अब न चर्चा करो तुम मेरी मुहब्बत की हुजूऱ ।अब तलक मुझको…"
11 hours ago
TEJ VEER SINGH commented on Nilesh Shevgaonkar's blog post ग़ज़ल नूर की - मुझ को कहा था राह में रुकना नहीं कहीं
"हार्दिक बधाई आदरणीय निलेश जी।बेहतरीन गज़ल। तुम क्या गए तमाम नगर अजनबी हुआ मुद्दत हुई है घर से…"
11 hours ago
TEJ VEER SINGH commented on TEJ VEER SINGH's blog post मुआवज़ा - लघुकथा -
"हार्दिक आभार आदरणीय शेख उस्मानी साहब जी।"
11 hours ago
Samar kabeer commented on Nilesh Shevgaonkar's blog post ग़ज़ल नूर की - मुझ को कहा था राह में रुकना नहीं कहीं
"जनाब निलेश 'नूर' साहिब आदाब,उम्दा ग़ज़ल हुई है,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ…"
11 hours ago
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Zohaib's blog post ग़ज़ल (ज़ख्म सारे दर्द बन कर)
"वाह बढ़िया ग़ज़ल ज़नाब जोहैब जी..तीसरे शेर में रदीफ़ेन दोष है क्या?"
12 hours ago
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Zohaib's blog post ग़ज़ल (सुन कर ये तिरी ज़ुल्फ़ के मुबहम से फ़साने)
"वाह बहुत ही खूब ग़ज़ल हुई है ज़नाब..मुबारक़"
12 hours ago
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on सतविन्द्र कुमार राणा's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय सतविंद्र जी बढ़िया ग़ज़ल कही है..सादर"
12 hours ago
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Pradeep Devisharan Bhatt's blog post "दीवाना "
"अच्छी ग़ज़ल कही ज़नाब प्रदीप जी..बधाई"
12 hours ago
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Sushil Sarna's blog post अनकहा ...
"वाह बढ़िया कविता आदरणीय..."
12 hours ago
Sheikh Shahzad Usmani commented on Chandresh Kumar Chhatlani's blog post अमृतसर रेल दुर्घटना विभीषिका पर 5 लघुकथाएं
"ये पांचों बेहतरीन लघुकथायें फीचर किये जाने पर तहे दिल से बहुत-बहुत मुबारकबाद मुहतरम जनाब  डॉ.…"
12 hours ago
Sheikh Shahzad Usmani commented on TEJ VEER SINGH's blog post मुआवज़ा - लघुकथा -
"आजा... आजा... मुआवज़ा आजा। भ्रष्टाचार के आदी , योजनाओं व घोषणाओं के अवैध  हितग्राहियों पर बेहद…"
13 hours ago

© 2018   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service