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सबके लिए है कुछ न कुछ, मुंबई मे ज़रूर ।

एक बार सही मुंबई में बस आइए ज़रूर॥

 

निर्विघ्न हो जब हाथ है सर पे विघ्नहर्ता का।

श्रद्धा तू रख ये होंगे सिद्ध एक दिन ज़रूर।।

 

खाली नहीं लौटा है बशर, हाजी-अली से।

नीयत अगर है साफ, तो रहमत मिले ज़रूर॥

 

रुकती नहीं ये भागती, रहती है रात-दिन ।

मिल जाएगा तुझको भी, तेरा हमसफर ज़रूर।।

 

सपनों की नगरी करती है अहतराम सभी का ।

जिसमें हो फ़न बन जाएगा फनकार भी ज़रूर।।  

 

होकर उदास इस तरह, बैठो नहीं ‘प्रदीप’

किस्मत अगर है साथ तो, मंजिल मिले ज़रूर

-प्रदीप भट्ट-

 

“रचना मौलिक एवं अप्रकाशित है”

 

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' yesterday

इस मंच पे आप बहुत कुछ सीख सकते हैं...आदरणीय समर जी की बात का संज्ञान लें..

Comment by Samar kabeer on Friday

जनाब प्रदीप भट्ट साहिब आदाब,अगर ये ग़ज़ल है, तो बहुत समय चाहती है,क्योंकि इसमें रदीफ़ तो है लेकिन बह्र और क़वाफ़ी नदारद हैं ,बहरहाल इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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